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शनिवार, 20 मार्च 2010

नवाहे-दिल में है.....

नवाहे-दिल में है आंखों के रू-ब-रू न सही.
तेरा ही अक्स है, इस आईने में तू न सही.


बहुत सताएगी मिलने की आरजू इक दिन
कि मुझको तेरी, तुझे मेरी जुस्तजू न सही.


नज़र मिले न मिले फिर भी बात कर लेना
हमारे दर्मियां कुछ वज्हे-गुफ्तगू न सही.


हमारे दौर की रफ़्तार तो सलामत है
लरजते, टूटते लम्हों की आबरू न सही।


किसी रफ़ीक के क़दमों की चाप तो आये
दरे-खयाल पे अब दस्तके-अदू न सही.


तेरे हिसारे-नज़र में है मेरी जामादरी
ये और बात मुझे हाज़ते- रफू न सही.


हमारे वास्ते ये ज़िन्दगी बसर कर लो
तुम्हारे दिल में अब जीने की आरजू न सही.


गुज़िश्ता वक़्त की धुंधली सी याद बाकी है
हरेक लम्हे की तस्वीर हू-ब-हू न सही.


असीरे-हल्का-ये- वहमो-गुमां न हो गौतम
तू आज अपनी हकीकत के रू-ब-रू न सही.


----देवेंद्र गौतम 

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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