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शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

चार दोहे


गूंगी नगरी, बहरा राजा, झूठी ठाट और बाट.
समय चटाई पर लेटा है, खड़ी है सबकी खाट.

सूखी धरती पानी मांगे, दलदल मांगे धूप.
दाता कहता बस रहने दो, जिसका जैसा रूप.

धनवानों पर धन बरसाए, निर्धन पऱ प्रहार.
यारब! तेरी दुनिया न्यारी, लीला अपरंपार.

हर याचक को पता है अपने दाता की औकात.
अधजल गगरी जब छलकेगी, बांटेगा खैरात.

-देवेंद्र गौतम

कत्आ़


घुड़कियां दे के हमें कब तलक डराएगा
वो सच को झूठ के पर्दे में जब छुपाएगा.
हरेक सच को इशारों में अयां कर देंगे
जबां पे ताला कहां तक कोई लगाएगा.
-देवेंद्र गौतम

सोमवार, 26 अगस्त 2019

कत्आ़


उसे मरना है उसकी मौत को आसान होने दो.
वो कुर्बानी का बकरा है उसे कुर्बान होने दो.
वो वहशी है चलो माना ज़मी के बोझ जैसा है
उसे इंसां बना सकते हो तो इनसान होने दो।

-देवेंद्र गौतम

रविवार, 18 अगस्त 2019

घर के अंदर घर जला देने की साज़िश हो रही है


मौसमों की किस कदर हमपर नवाज़िश हो रही है.
रोज आंधी आ रही है, रोज बारिश हो रही है.

रात-दिन सपने दिखाए जा रहे हैं हम सभी को
बैठे-बैठे आस्मां छूने की कोशिश हो रही है.

शक के घेरे में पड़ोसी भी है लेकिन दरहक़ीकत
घर के अंदर घर जला देने की साज़िश हो रही है.

जंगलों में आजकल इनसान देखे जा रहे हैं
और शहरों में दरिंदों की रहाइश हो रही है.

अब यहां कुदरत की खुश्बू की कोई कीमत नहीं है
हर तरफ कागज के फूलो की नुमाइश हो रही है.