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शुक्रवार, 24 मई 2013

वो बारूद का पुतला है, विस्फोट करेगा



जितनी जंजीरें हैं उनपर चोट करेगा

वो बारूद का पुतला है, विस्फोट करेगा.

वक्त का पहिया कुछ तेजी से घूमेगा
काम मगर इंसानों का रोबोट करेगा.

वो बिल्कुल खामोश रहेगा महफिल में
चुपके-चुपके सबकी बातें नोट करेगा.

पहले खाकी वर्दी वाले लूटेंगे
बाकी जो करना है काला कोट करेगा.

बैलट पर जितने चेहरे हैं दागी हैं
सोचे अब मतदाता किसको वोट करेगा.

आज का रावण, आज की सीता, या मालिक
कितना परदा इक तिनके की ओट करेगा.

---देवेंद्र गौतम


शनिवार, 18 मई 2013

सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो

खूब सजा के रख बाजार में जैसा हो.
सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो.

पूजा की थाली में रक्खा जाता है
तुलसी का पत्ता आकार में जैसा हो.

उससे निस्बत रखनी है तो रखनी है
मिलने-जुलने बात विचार में जैसा हो.

घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
मोल भले उसका बाजार में जैसा हो.

दिन के उजाले में मासूम ही दिखता है
उसका चेहरा अंधकार में जैसा हो.

उसपर कोई आंच नहीं आने देना
घर का बच्चा है व्यवहार में जैसा हो.

--देवेंद्र गौतम

मंगलवार, 14 मई 2013

वो अपने आठ पहर में से दोपहर ही दे

हवा के दोश पे उड़ता हुआ शरर ही दे.
वो कुछ न दे तो तमाजत का इक सफर ही दे

वो मौज दे नहीं सकता, न दे, भंवर ही दे.
करीब आके ये किस्सा तमाम कर ही दे.

न अपना हाल बताये, न मेरा हाल सुने
न अपने ठौर ठिकाने की कुछ खबर ही दे.

मेरे रुके हुए कदमों का वास्ता है तुझे
जहां पे लोग भटकते हैं वो डगर ही दे.

मैं पूरे दिन पे कभी हक नहीं जताउंगा
वो अपने आठ पहर में से दोपहर ही दे.

मेरी उमीद का गुलशन उजड़ नहीं पाये
हरेक बीज के अंदर कोई शजर ही दे.

अब उसकी सल्तनत में सर कहां छुपाये हम
हमें न रहने दे फुटपाथ पे न घर ही दे.

मैं उससे चांद सितारे तो नहीं मांगूंगा
बस एक बार इनायत भरी नजर ही दे.

--देवेंद्र गौतम



शनिवार, 11 मई 2013

किसी खुदा का हमें कोई डर नहीं होता

उसे कहीं भी भटकने का डर नहीं होता.
वो जिसके साथ कोई राहबर नहीं होता.

हम इस जहां में फकत आदमी से डरते हैं
किसी खुदा का हमें कोई डर नहीं होता.

न जाने कौन सी मिट्टी के बने होते हैं
किसी की बात का जिनपे असर नहीं होता

हरेक शख्स में इंसानियत नहीं होती
हरेक शख्स मगर जानवर नहीं होता.

वहां किसी पे भरोसा भी हो तो कैसे हो
खुद अपना साया जहां मोतबर नहीं होता.

न जाने कैसे दुआयें कुबूल होती हैं
मेरी दुआ का जरा भी असर नहीं होता.

कहीं पे कुछ तो हुआ है जो ऐसा आलम है
इतना वीरान तो कोई नगर नहीं होता.

----देवेंद्र गौतम

शनिवार, 4 मई 2013

कौन कमबख्त मुस्कुराता है


दर्द को तह-ब-तह सजाता है.
कौन कमबख्त मुस्कुराता है.

और सबलोग बच निकलते हैं
डूबने वाला डूब जाता है.

उसकी हिम्मत तो देखिये साहब!
आंधियों में दिये जलाता है.

शाम ढलने के बाद ये सूरज
अपना चेहरा कहां छुपाता है.

नींद आंखों से दूर होती है
जब भी सपना कोई दिखाता है.

लोग दूरी बना के मिलते हैं
कौन दिल के करीब आता है.

तीन पत्तों को सामने रखकर
कौन तकदीर आजमाता है?

---देवेंद्र गौतम