समर्थक

तरही गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तरही गज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

हमको जिसका मलाल था क्या था

कोई सुर था न ताल था क्या था
बेख़ुदी का धमाल था क्या था
ख्वाब था या खयाल था क्या था
हमको जिसका मलाल था क्या था
तुमने पत्थर कहा, खुदा हमने
अपना-अपना ख़याल था क्या था
आग भड़की तो किस तरह भड़की
जेहनो-दिल में उबाल था क्या था
सारे किरदार एक जैसे थे
हर कोई बेमिसाल था क्या था
मौत को हम गले लगा बैठे
ज़िन्दगी का सवाल था क्या था
रास्ते बंद हो चुके थे क्या
आना-जाना मुहाल था क्या था
जिससे रफ़्तार की तवक़्क़ो थी
काले घोड़े की नाल था क्या था
कोई बाज़ी लगी थी आपस में
या कि सिक्का उछाल था क्या था
देवेन्द्र गौतम 08860843164

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

खुश्क पत्तों सा बिखर जाना है

हर तलातुम से गुज़र जाना है
दिल के दरिया में उतर जाना है
ज़िंदा रहना है कि मर जाना है
‘आज हर हद से गुज़र जाना है’
मौत की यार हक़ीक़त है यही
बस ये अहसास का मर जाना है
पेड़ से टूट गए हैं जैसे
खुश्क पत्तों सा बिखर जाना है
सब ज़मींदोज़ उभर आये हैं
अब दुआओं का असर जाना है
वादा करना तो अदा है उनकी
वक़्त आने पे मुकर जाना है
सर खपाने से नहीं होता कुछ
जो गुज़रना है गुज़र जाना है
वक़्त के आइना दिखलाते ही
रंग चेहरे का उतर जाना है
हम तो आवारा हैं ‘गौतम’ साहब
आप कहिये कि किधर जाना है
-देवेन्द्र गौतम

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

जो अपना नाम किसी फन में कर गए रौशन.
उन्हीं के नक्शे-कदम पर हैं काफिले रौशन.

ये कैसे दौर से यारब, गुजर रहे हैं हम
न आज चेहरों पे रौनक न आइने रौशन.

किसी वरक़ पे हमें कुछ नजऱ न आएगा
किताबे-वक्त में जब होंगे हाशिये रौशन

हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
किसी गरीब की कुटिया कोई करे रौशन.

हरेक सम्त अंधेरों की सल्तनत है मगर
दिलों में फिर भी उमीदों के हैं दिये रौशन.

हमारे पांव तो कबके उखड़ चुके हैं मगर
ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

सवाल सबके भरोसे का है मेरे भाई
कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन.
--देवेंद्र गौतम