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सोमवार, 6 अगस्त 2018

हरेक शाह के अंदर कोई फकीर भी था.

नज़र के सामने ऐसा कोई  नज़ीर  भी  था ?
हरेक शाह के अंदर कोई फकीर भी था ?

वो अपने आप में रांझा ही नहीं हीर भी था.
बहुत ज़हीन था लेकिन जरा शरीर भी था.

किसे बचाते किसे मारकर निकल जाते
हमारे सामने प्यादा भी था वज़ीर भी था.

अना के नाम पे कुर्बानियां भी थीं लेकिन
हरेक हाट में बिकता हुआ जमीर भी था.

वहां पे सिर्फ नुमाइश लगी थी चेहरों की
किसी लिबास के अंदर कोई शरीर भी था?

मैं उसको छोड़ के जा भी तो नहीं सकता था
वो मेरा दोस्त भी था और बगलगीर भी था.

मगर सटीक निशाना नहीं था पहले सा
वही कमान, वही हाथ, वही तीर भी था.

-देवेंद्र गौतम






शनिवार, 4 अगस्त 2018

कितनी नफरत फैलानी है, बोलोगे?


मन की मैल हवा में कितना घोलोगे?
कितनी नफरत फैलानी है, बोलोगे?

सोचो सड़कों पर कितना कोहराम मचेगा
तुम तो चादर तान के घर में सो लोगे.

तेरी झोली और तिजोरी भर जाएगी
एक-एक कर जब हर नाव डुबो लोगे.

हमें पता है फिर कोई माया रचकर
दामन पर जो दाग़ लगेंगे धो लोगे.

तेरी आंत के अंदर हम आ बैठे हैं
अपने मन की गांठ कहां पर खोलोगे.



मंगलवार, 10 जुलाई 2018

चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे


कहां आवाज़ देनी थी, कहां दस्तक लगा बैठे.
चिता को आग देने में हथेली ही जला बैठे.

मिला मौका तो वो ज़न्नत को भी दोज़ख बना बैठे.
जिन्हें सूरज उगाना था, दीया तक को बुझा बैठे.

अलमदारों की बस्ती में लगी थी हाट गैरत की
हमारे पास इक खोटा सा सिक्का था, चला बैठे.

बदी फितरत में थी ताउम्र बदकारों में शामिल थे
कभी नेकी अगर की भी तो दरिया में बहा बैठे.

सलाहें मुफ्त में जो बांटते फिरते हैं हम सबको
अमल करते कभी खुद पे तो देते मश्विरा बैठे.

पुरानी अज़मतों का तज़किरा करते रहे लेकिन
विरासत में मिली हर चीज मिट्टी में मिला बैठे.-

-देवेंद्र गौतम

सोमवार, 11 जून 2018

चार तिनकों का आशियाना हुआ

चार तिनकों का आशियाना हुआ,
आंधियों में मेरा ठिकाना हुआ।

जिसको देखे बिना करार न था,
उसको देखे हुए जमाना हुआ।

मरना जीना तो इस जमाने मेंं,
मिलने-जुलने का इक बहाना हुआ।

हर कदम मुश्किलों भरा यारब
किस मुहूरत में मैं रवाना हुआ।

और दुश्वारियां न कर पैदा,
बस बहुत सब्र आजमाना हुआ।

भूल जाएंगे सब मेरा किस्सा,
मैं गए वक़्त का फसाना हुआ।

शुक्रवार, 8 जून 2018

ग़म की धूप न खाओगे तो खुशियों की बरसात न होगी


ग़म की धूप न खाओगे तो खुशियों की बरसात न होगी.
दिन की कीमत क्या समझोगे जबतक काली रात न होगी.

जीवन के इक मोड़ पे आकर हम फिर से मिल जाएं भी तो
लब थिरकेंगे, दिल मचलेगा, पर आपस में बात न होगी.

पूरी बस्ती सन्नाटे की चादर ओढ़ के लेट चुकी है
ऐसे में तूफान उठे तो कुछ हैरत की बात न होगी.

हम अपने सारे मोहरों की चाल समझते हैं साहब
बाजी अब चाहे जैसी हो लेकिन अपनी मात न होगी.

जिस दिन उसमें नूर न होगा, आप उगेगा, आप ढलेगा
चांद तो होगा साथ में लेकिन तारों की बारात न होगी.

गुरुवार, 7 जून 2018

अच्छे दिनों का कौन करे इंतजार और.


आखिर कहां से लाइए सब्रो-करार और.
अच्छे दिनों का कौन करे इंतजार और.

कुछ रहगुजर पे धूल भी पहले से कम न थी
कुछ आपने उड़ा दिए गर्दो-गुबार और.

बिजली किधर से दौड़ रही थी पता नहीं
हर तार से जुड़ा हुआ था एक तार और.

शायद अभी यक़ीन का दर हो खुला हुआ
चक्कर लगा के देखते हैं एक बार और.

हम उनकी अक़ीदत की कहानी भी कहेंगे
चढ़ने दे अभी आंख में थोड़ा खुमार और.

हमलोग तो बिगड़े हुए हालात हैं गोया
खाना है अभी वक्त के चाबुक की मार और.

मैंने कहा किसी की दुआ काम न आई
उसने कहा ख़ुदा पे करो ऐतबार और.

आसां नहीं है वक्त के फंदों को काटना
कितना भी करा लाइए चाकू में धार और

गौतम जो सामने है उसी को कुबूल कर
माना बचे हुए हैं अभी जां-निसार और.

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

रह गए सारे कलंदर इक तरफ

वक्त के सारे सिकंदर इक तरफ.
इक तरफ सहरा, समंदर इक तरफ.

इक तरफ तदबीर की बाजीगरी
और इंसां का मुकद्दर इक तरफ.

आस्मां को छू लिया इक शख्स ने
रह गए सारे कलंदर  इक तरफ.

इक तरफ लंबे लिफाफों का सफर
पांव से छोटी है चादर इक तरफ.

इक तरफ खुलती हुई नज्जारगी
डूबते लम्हों का लश्कर  इक तरफ.

रोज हम करते हैं बातें अम्न की
रोज उठता है बवंडर इक तरफ.

-देवेंद्र गौतम


शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

सर पटककर रह गए दीवार में.

जो यकीं रखते नहीं घरबार में.
उनकी बातें किसलिए बेकार में.

दर खुला, न कोई खिड़की ही खुली
सर पटककर रह गए दीवार में.

बस्तियां सूनी नज़र आने लगीं
आदमी गुम हो गया बाजार में.

पांव ने जिस दिन जमीं को छू लिया
ज़िंदगी भी आ गई रफ्तार में.

बांधकर रखा नहीं होता अगर
हम भटक जाते किसी के प्यार में.

एक बाजी खेलकर जाना यही
जीत से ज्यादा मज़ा है हार में.

शनिवार, 26 अगस्त 2017

बस मियां की दौड़ मस्जिद तक न हो.

चाल वो चलिए किसी को शक न हो.
बस मियां की दौड़ मस्जिद तक न हो.

सल्तनत आराम से चलती नहीं
सरफिरा जबतक कोई शासक न हो.

सांस लेने की इजाजत हो, भले
ज़िंदगी पर हर किसी का हक न हो.

खुश्क फूलों की अदावत के लिए
एक पत्थर हो मगर चकमक न हो.

रंग काला हो, कोई परवा नहीं
हाथ में उसके मगर मस्तक न हो.

तब तलक मत लाइए मैदान में
जब तलक वो दौड़ने लायक न हो.

-देवेंद्र गौतम










मंगलवार, 15 अगस्त 2017

दोनों तरफ के लोग हैं जिद पर अड़े हुए

हम उनकी उंगलियों में थे कब से पड़े हुए.
कागज में दर्ज हो गए तो आंकड़े हुए.

ऊंची इमारतों में कहीं दफ्न हो गईं
वो गलियां जिनमें खेलके हम तुम बड़े हुए.

मुस्किल है कोई बीच का रस्ता निकल सके
दोनों तरफ के लोग हैं जिद पर अड़े हुए.

दरिया में थे तो हम सभी कश्ती की तरह थे
मिट्टी के पास आ गए तो फावड़े हुए.

हमने ज़मीं को सींच दिया अपने लहू से
कुछ लोग जंग जीत गए बिन लड़े हुए.

घुटनों में बल नहीं था मगर हौसला तो था
पूछो, हम अपने पांव पे कैसे खड़े हुए.

तख्ती पे था लिखा हुआ दस्तक न दे कोई
जैसे कि उनके दर पे हों हीरे जड़े हुए.

-देवेंद्र गौतम


रविवार, 2 अक्तूबर 2016

चुप लगा जाना अलग है, बेजु़बानी और है.

दास्तां उनकी अलग, मेरी कहानी और है
मैं तो दरिया हूं मेरे अंदर रवानी और है.
कौन समझेगा हमारी कैफ़ि‍यत अबके बरस
कह रही है कुछ ज़बां लेकिन कहानी और है.
वो अगर गूंगा नहीं होगा तो बोलेगा ज़रूर
चुप लगा जाना अलग है, बेजु़बानी और है.
आपने अबतक ज़मीं की तह में देखा ही नहीं
और बर्फ़ीली नदी है और पानी और है.
यूं तो कितनी ही रुतों को झेलते आए हैं हम
आज का मौसम मगर कुछ इम्तहानी और है.
एक खुशबू है कि जो बेचैन रखती है हमें
फूल सब अपनी जगह हैं रातरानी और है.
उसने हर इल्जाम अपने सर पे आखिर क्यों लिया
लोग कहते हैं कि अंदर की कहानी और है।
यूं तो बेपर की उड़ाने हम भी भरते हैं मगर
आज कुछ अपना इरादा आसमानी और है.
और क़ि‍स्सागो सुनाते हैं अलग अंदाज़ से
दास्ताने-ज़िंदगी मेरी ज़बानी और है।
देवेंद्र गौतम

बुधवार, 29 जून 2016

उम्रभर की यही कमाई है.

हर घड़ी ग़म से आशनाई है.
ज़िंदगी फिर भी रास आई है.

आस्मां तक पहुंच नहीं लेकिन
कुछ सितारों से आशनाई है.

अपने दुख-दर्द बांटता कैसे
उम्रभर की यही कमाई है.

ख्वाब में भी नज़र नहीं आता
नींद जिसने मेरी चुराई है.

अब बुझाने भी वही आएगा
आग जिस शख्स ने लगाई है.

काफिले सब भटक रहे हैं अब
रहनुमाओं की रहनुमाई है.

झूठ बोला है जब कभी मैंने
मेरी आवाज़ लड़खड़ाई है

कोई बंदा समझ नहीं पाया
क्या ख़ुदा और क्या खुदाई है.

-देवेंद्र गौतम

शुक्रवार, 10 जून 2016

हम कहां हैं, हमें पता तो चले.

और कुछ दूर काफिला तो चले.
हम कहां हैं, हमें पता तो चले.

हमसफर की तलब नहीं हमको
साथ कदमों के रास्ता तो चले.

बंद कमरे में दम निकलता है
इक जरा सांस भर हवा तो चले.

हर हकीक़त बयान कर देंगे
आज बातों का सिलसिला तो चले.

अपनी मर्जी के सभी मालिक हैं
कोई कानून-कायदा तो चले.

वो अकेले कहां-कहां जाते
साथ लेकर कोई चला तो चले.

बुधवार, 4 मई 2016

हर कोई भागता मिला है मुझे

अपनी रफ़्तार दे गया है मुझे
जब कोई रहनुमा मिला है मुझे
वक़्त के साथ इस ज़माने में
हर कोई भागता मिला है मुझे
उससे मिलने का या बिछड़ने का
कोई शिकवा न अब गिला है मुझे
तजरबे हैं जो खींच लाते हैं
वर्ना अब कौन पूछता है मुझे
क्या बताएगा अब नजूमी भी
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’
वैसी सूरत उसे दिखाता हूं
जैसी सूरत में देखता है मुझे
ये जिहालत नहीं अंधेरा है
इस अंधेरे को जीतना है मुझे
अक्स बनकर रहा हूं मैं ‘गौतम’
अपना चेहरा कहां मिला है मुझे
देवेन्द्र गौतम 08527149133

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

मैं थककर अगर तेरी बाहों में आऊं.

फुगाओं से निकलूं तो आहों में आऊं.
कदम-दर-कदम बेपनाहों में आऊं.

मैं चेहरों के जंगल में खोया हुआ हूं
मैं कैसे तुम्हारी निगाहों में आऊं.

कभी मैं अंधेरों की बाहें टटोलूं
कभी रौशनी की पनाहों में आऊं.

मैं इक सनसनीखेज़ किस्सा हूं गौया
शराफत से निकलूं गुनाहों में आऊं.

अभी तक तो पगडंडियों पे कटी है
किसी रोज तो शाहराहों में आऊं.

कभी मरघटों में मिलूं आग बनकर
कभी बर्फ की कब्रगाहों में आऊं.

पहाड़ों मुझे थाम लेना किसी दिन
मैं थककर अगर तेरी बाहों में आऊं.

-देवेंद्र गौतम

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

फिर इतिहास भुला बैठे.

(जेएनयू प्रकरण पर)
तिल का ताड़ बना बैठे.
कैसी आग लगा बैठे.

वही खता दुहरा बैठे.
फिर इतिहास भुला बैठे.

फर्क दोस्त और दुश्मन का
कैसे आप भुला बैठे.

पुरखों के दामन में वो
गहरा दाग लगा बैठे.

सबका हवन कराने में
अपने हाथ जला बैठे.

उसकी गरिमा रख लीजे
जिस कुर्सी पर जा बैठे.

बैठे-बैठे वो हमको
कितने ख्वाब दिखा बैठे.

किस दुनिया के वासी हैं
किस दुनिया में जा बैठे.

सारी रामायण कह दी
असली बात भुला बैठे.

-देवेंद्र गौतम

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

धूप जैसे चांदनी रातों में हो घुलती हुई सी.

  उलझनों की धुंद सबके ज़ेहन में फैली हुई सी.
वक़्त की गहराइयों में ज़िंदगी उतरी हुई सी.

हर कोई अपनी हवस की आग में जलता हुआ सा
और कुछ इंसानियत की रूह भी भटकी हुई सी.

आपकी यादें फज़ा में यूं हरारत भर रही हैं
धूप जैसे चांदनी रातों में हो घुलती हुई सी.

बर्फ से जमते हुए माहौल के अंदर कहीं पर
एक चिनगारी भड़कने के लिए रखी हुई सी.

रोजो-शब के पेंचो-खम का ये करिश्मा भी अजब है
हम वही, तुम भी वही, दुनिया मगर बदली हुई सी.

चार-सू तारीक़ लम्हों का अजब सैले-रवां है
रौशनी जिसमें की सदियों से है सिमटी हुई सी.

जा-ब-जा वहमो-गुमां के तुंद झोंके मौज़ेजन से
और अब अपने यकीं की नींव भी हिलती हुई सी.

फिर ख़यालों की बरहना शाख पे पत्ते उगे हैं
फिर मेरे दिल में है इक नन्हीं कली खिलती हुई सी.

-देवेंद्र गौतम


सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

इस सफर में मेरे पीछे इक सदी रह जाएगी.

रहगुजर पे रहबरों की रहबरी रह जाएगी.
ज़िंदगी फिर ज़िंदगी को ढूंढती रह जाएगी.

मैं चला जाउंगा अपनी प्यास होठों पर लिए
मुद्दतों दरिया में लेकिन खलबली रह जाएगी.

रौशनी की बारिशें हर सम्त से होंगी मगर
मेरी आंखों में फरोजां तीरगी रह जाएगी.

हर कदम पर मैं बिखर जाउंगा राहों की तरह
इस सफर में मुझको मंजिल ढूंढती रह जाएगी.

दिन के आंगन में सजीली धूप रौशन हो न हो
रात के दर पर शिकस्ता चांदनी रह जाएगी.

हमको दुनिया भर की दौलत भी मयस्सर हो तो क्या
ज़िंदगी में कुछ न कुछ फिर भी कमी रह जाएगी.

झिलमिलाती साअतों की रहगुजर पे मुद्दतों
रौशनी शामो-सहर की कांपती रह जाएगी.

लम्हा-लम्हा बेसबब होते रहेंगे रोजो-शब
इस सफर में मेरे पीछे इक सदी रह जाएगी.

-देवेंद्र गौतम

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.

आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.
और तबीयत भी मेरी आज रवानी में नहीं.

काफिला उम्र का समझो कि रवानी में नहीं.
कुछ हसीं ख्वाब अगर चश्मे-जवानी में नहीं.

खुश्क होने लगे चाहत के सजीले पौधे
और खुशबू भी किसी रात की रानी में नहीं.

क्या जरूरी है उसे सबको सुनाया जाए
कुछ नई बात अगर अपनी कहानी में नहीं.

चंद खुशरंग से लम्हों की कसक है गोया
और कुछ भी मेरी रंगीन बयानी में नहीं.