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सोमवार, 3 जनवरी 2011

कैसे-कैसे ख्वाब इन आंखों में....

कैसे-कैसे ख्वाब इन आंखों में संजोते थे हम.
नींद जब गहरी न थी तो देर तक सोते थे हम.

बारहा मिलते थे लेकिन टूटकर मिलते न थे
कुछ कसक रहती थी दिल में जब जुदा होते थे हम.

भीड़ में रखते थे हम भी इक तबस्सुम जेरे-लब
लेकिन जब होते थे तन्हा आंख भिंगोते थे हम.

उन दिनों हम भी नशे में खुलते थे कहते हैं लोग
बात कुछ करते न थे जब होश में होते थे हम.

लम्हा-लम्हा मुस्कुरा के थाम लेता था हमें
वक़्त की बहती नदी में हाथ जब धोते थे हम.


----देवेंद्र गौतम 

1 टिप्पणियाँ:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बारहा मिलते थे लेकिन टूटकर मिलते न थे कुछ कसक रहती थी दिल में जब जुदा होते थे हम.

वाह वाह...इस खूबसूरत गज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें...

नीरज

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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