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शनिवार, 29 जनवरी 2011

सब दरख्तों पे वही अक्से-खिज़ानी.......

सब दरख्तों पे वही अक्से-खिज़ानी कब तलक.
वक़्त के सूरज की ये शोला फ़िशानी कब तलक.


रास्तों की आँख से निकलेगा पानी कब तलक.
मंजिलों के नक्श होंगे इम्तहानी कब तलक.


दिल में शोला कब तलक, आँखों में पानी कब तलक.
रास्तों की खाक छाने जिंदगानी कब तलक.


हर बरस गुज़रा है हमपे एक आफत की तरह
ऐ खुदा! हमपे तुम्हारी मेहरबानी कब तलक.


ख्वाहिशों की धूप में तपता रहा दिल का चमन
यूँ मुरादों की उगेगी रातरानी कब तलक.


कब तलक कह पाऊंगा मैं आपबीती दोस्तों!
आप भी सुन पाएंगे मेरी कहानी कब तलक.


नींद की बस्ती में गौतम और भी तो लोग हैं
तू ही तन्हा ख्वाब देखे आसमानी कब तलक


-----देवेन्द्र गौतम .

3 टिप्पणियाँ:

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत सारे सवाल मुंह बाएं खड़े हैं , दर्द जैसे ग़ज़ल में उतरा है ...

राकेश कौशिक ने कहा…

वाह वाह गौतम जी - बहुत सुंदर - लाजवाब शेरों से सजी बेमिशाल ग़ज़ल

निर्मला कपिला ने कहा…

मतला और मक्ता दोनो कमाल के हैं। पूरी गज़ल आपकी लाजवाब है लेकिन ये शेर--
ख्वाहिशों की धूप में तपता रहा दिल का चमन
यूँ मुरादों की उगेगी रातरानी कब तलक.
सब से कमाल का है। बधाई इस गज़ल के लिये

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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