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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

अहसास के सीने में जो......

अहसास के सीने में जो गिर्दाबनुमा था.
ज़ज्बों की नदी में वही सैलाबनुमा था.


जलवा तेरा जैसे परे-सुर्खाबनुमा था.
आया था सरे-चश्म मगर ख्वाबनुमा था.


सहरा में घनी प्यास लिए लोग खड़े थे
कुछ दूर झलकता हुआ वो आबनुमा था.


मिलता था वही रात को ख्वाबों की गुफा में
जो दिन की घनी धूप में नायाबनुमा था.


हल्का सा तवारुफ़ था तो थोड़ी सी मुलाक़ात
वो अजनवी जैसा था पर अह्बाबनुमा था.


आवाज़ थी उलझी हुई गौतम के गले में
सीने में अज़ब खौफ का जह्राबनुमा था.


----देवेन्द्र गौतम 

6 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

अहसास के सीने में जो गिर्दाबनुमा था.
ज़ज्बों की नदी में वही सैलाबनुमा था.
वाह !
बहुत ख़ूबसूरत मतला !और हासिले ग़ज़ल शेर भी

kshama ने कहा…

सहरा में घनी प्यास लिए लोग खड़े थे
कुछ दूर झलकता हुआ वो आबनुमा था.
Wah! Kya gazal hai!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय गौतम जी
अभिवादन !

ओह ! इतने कठिन क़ाफ़ियों के साथ इतनी शानदार ग़ज़ल ?! मुबारकबाद है ।

सारे शे'र , पूरी ग़ज़ल काबिले-ता'रीफ़ है , मतले सहित ये दोनों शे'र ज़्यादा पसंद आए -
सहरा में घनी प्यास लिए लोग खड़े थे
कुछ दूर झलकता हुआ वो आबनुमा था.

हल्का सा तवारुफ़ था तो थोड़ी सी मुलाकात
वो अजनबी जैसा था पर अह्बाबनुमा था.


हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

शारदा अरोरा ने कहा…

सारी ही ग़ज़लें खूबसूरत हैं , भाव की बेहतरीन अभिव्यक्ति के साथ ...ग़ज़ल कलेक्शन प्रकाशित कराना चाहते हैं ...सब लोग कहते हैं कि अपने खर्च पर करवा सकते हैं ...वक्त को जब मंजूर हो ...तो वो जर्रे को भी उठा देता है , आप तो अच्छा लिखते हैं पर आप पाएंगे कि अपनी बिरादरी के लोग भी शायद ही साथ दें ...

ghazalganga ने कहा…

शारदा जी
हौसला-अफजाई के लिए शुक्रगुजार हूँ. आपने मेरी ग़ज़लों के संकलन के प्रकाशन में आनेवाली व्यावहारिक समस्याओं के बहाने प्रकाशन जगत की तल्ख़ सच्चाई रख दी. मैं अक्सर सोचता हूँ कि बेस्टसेलर किताबें अंग्रेजी या यूरोपीय भाषाओँ में ही क्यों लिखी जाती हैं. हिंदी या उर्दू क़ी अच्छी से अच्छी किताब क़ी हज़ार प्रतियाँ भी क्यों नहीं खप पातीं. मेरे विचार से समस्या न रचनाकारों में है न पाठकों में. समस्या प्रकाशकों में है. वे जरा सा भी जोखिम उठाना नहीं चाहते. किसी प्रोडक्ट क़ी मार्केटिंग कैसे क़ी जाती है उन्हें मालूम नहीं. वे सस्ते नावेलों के पाठक ढूँढ सकते हैं लेकिन स्तरीय साहित्य के पाठकों तक पैठ नहीं बना पाते. इसकी ज़रुरत भी नहीं समझते. सरकारी संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं और पुस्तकालयों तक ही उनकी मार्केटिंग सीमित है. पुस्तक मेलों के जरिये अब कुछ गंभीर पाठकों तक उनकी पहुँच जरूर बन रही है. मुझे लगता है कि हिंदी-उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओँ को कुछ दिलेर और दूरदर्शी प्रकाशकों क़ी ज़रूरत है. बहरहाल मैं ज़रा लीक से हटकर चलने का आदी रहा हूँ. शुरूआती दौर में पत्र-पत्रिकाओं को रचनाएँ भेजता था. हिंदी में सारिका, उर्दू में शबखून, शायर, जावाज़, सुहैल, वक़्त आदि में बहुत सी ग़ज़लें छप भी चुकीं हैं. लेकिन अब मांग होने पर ही कहीं भेजता हूँ. अपनी रचनाएँ ब्लॉग में पोस्ट कर ज्यादा संतुष्टि मिलती है. एक नए जमात से जुड़ने का मौका मिल रहा है. मुझे लगता है कि भविष्य का सबसे सशक्त माध्यम यही होने जा रहा है. चाहूँ तो उर्दू अकादमी से वित्तीय सहायता ले सकता हूँ. गैर उर्दू भाषी होने के नाते यह आसानी से मिल भी सकता है. लेकिन ऐसा अभी सोचा नहीं.

निर्मला कपिला ने कहा…

मिलता था वही रात को ख्वाबों की गुफा में
जो दिन की घनी धूप में नायाबनुमा था.

अहसास के सीने में जो गिर्दाबनुमा था.
ज़ज्बों की नदी में वही सैलाबनुमा था.
मतले से ले कर मक्ते तक लाजवाब गज़ल है बधाई आपको।

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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