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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

तुम्हारे शह्र का दस्तूर ही निराला है

तमाम उम्र अंधेरों ने जिसको पाला है.
उसी के नाम पे कायम अभी उजाला है.

छुपा के रखता है खुद को सफेद कपड़ों में
हमें पता है, वो अंदर से बहुत काला है.

हम अपने आप ही गिरते हैं और संभलते हैं
यहां किसी को किसी ने कहां संभाला है.

सब अपने-अपने हिसारों में कैद रहते हैं
तुम्हारे शह्र का दस्तूर ही निराला है.

कभी भी खुलके मगर बात क्यों नहीं होती
तेरी ज़बां पे, न मेरी ज़बां पे ताला है.

किसी को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता
अंधेरा है कि तिरे शह्र में उजाला है.

-देवेंद्र गौतम

2 टिप्पणियाँ:

Digamber Naswa ने कहा…

वाह ... बहुत ही लाजवाब देवेंदे जी ... कमाल की बहर और गज़ल के शेर ...

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut badhiya likha hai..

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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