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शनिवार, 29 मार्च 2014

हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था

अंधी सी इक डगर थी, कोई राहबर न था
हम उसको ढूंढते थे उघर, वो जिधर न था
इतना कड़ा सफ़र था कि रूदाद क्या कहें
हर सम्त सिर्फ़ धूप थी, कोई शज़र न था
अहबाब की कमी न थी राहे-हयात में
लेकिन तुम्हारे बाद कोई मोतबर न था
सुनने को सारे शहर की सुनते थे हम मगर
हम पर किसी की बात का कोई असर न था
रखते थे अपने दिल में बिठाकर उसी को हम
आखों के सामने जो कभी जल्वागर न था
दरिया में डूबने का सबब कोई तो बताय
कश्ती के आसपास तो कोई भंवर न था
हम जानते थे मौत ही मंज़िल है आख़िरी
हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था
यूं तो वहां ख़ुलूस की कोई कमी न थी
उसकी गली में फिर भी हमारा गुज़र न था।
--देवेंद्र गौतम 08860843164

3 टिप्पणियाँ:

Digamber Naswa ने कहा…

सुनने को सारे शहर की सुनते थे हम मगर
हम पर किसी की बात का कोई असर न था
बहुत ही लाजवाब गज़ल देवेन्द्र जी ... मज़ा आ गया पूरी गज़ल पढ़ने के बाद ...

Satish Saxena ने कहा…

लाजवाब गज़ल !! :)

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…



☆★☆★☆



हम जानते थे मौत ही मंज़िल है आख़िरी
हमको किसी डगर पे भटकने का डर न था

वाह ! वाऽह…!
क्या शे'र कहा है !

आदरणीय देवेंद्र गौतम जी
बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...
हमेशा की ही तरह !
हर शे'र अपने आप में नायाब नग़ीना है...
पूरी ग़ज़ल कोट करने लायक है

यह शे'र मेरे मिजाज़ का है -
सुनने को सारे शहर की सुनते थे हम मगर
हम पर किसी की बात का कोई असर न था

:)

आशा है आप स्वस्थ-सानंद हैं...
मंगलकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार


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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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