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शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

उतर चुकें हैं सभी.....

उतर चुकें हैं सभी इस कदर जलालत पर.
कोई सलाख के पीछे कोई जमानत पर.

यहां किसी से उसूलों की बात मत करना
बिका हुआ है हरेक सख्स अपनी कीमत पर.

यकीन मानो कि सूरज पनाह मांगेगा
उतर गया कोई जर्रा अगर बगावत पर.

हुआ यही कि खुद अपना वजूद खो बैठा
वो जिसने दबदबा कायम किया था कुदरत पर.

अब तो इ-मेल पे होती है गुफ्तगू अपनी
 उडाता क्यों है कबूतर कोई मेरी छत पर.

किया भरोसा तो खुद अपने बाजुओं पे किया
हरेक जंग लड़ी हमने अपनी ताक़त पर.

लगा हुआ है अभी दांव पर हमारा वजूद
ये जंग जीतनी होगी किसी भी कीमत पर.


----देवेन्द्र गौतम

3 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

नमस्कार ,
मैं २४वीं ग़ज़ल से यहां तक आई तब टिप्पणी लिखा दिखाई दिया ,
मैंने सारी ग़ज़लें पढ़ीं ,बहुत उम्दा लिखते हैं आप ,इस ग़ज़ल का
मतला तो अच्छा है ही ये शेर बहुत उम्दा है

यकीन मानो कि सूरज पनाह मांगेगा
उतर गया कोई जर्रा अगर बगावत पर।

हर ग़ज़ल में ही ऐसे अश’आर हैं कि बेसाख़ता वाह !निकल जाए

gazalganga ने कहा…

shukriya

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

देवेन्द्र जी आप ने टिप्पणी का प्रावधान नहीं रखा है जिस की वजह से अक्सर मन की बात मन में ही रह जाती है अगर शुरू कर दें तो अच्छा होगा,शुक्रिया

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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