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बुधवार, 3 मार्च 2010

राई को पर्वत.......

राई को पर्वत बनाकर देखना.
बात जितनी हो बढ़ाकर देखना.


जाने किसमें हो अहल्या का निवास
तुम हरेक पत्थर को छूकर देखना.


नाखुदा को भी पड़ा है बारहा
कतरे-कतरे में समंदर देखना.


आज जाने दो मुझे फुर्सत नहीं है
फिर कभी मुझसे उलझकर देखना.


लाख मत चाहो मगर तुमको पड़ेगा
पाओं को बनते हुए सर देखना.


----देवेंद्र  गौतम 

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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