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गुरुवार, 31 मार्च 2011

अपने जैसों की मेजबानी में

अपने जैसों की मेजबानी में.
लुत्फ़ आता है लामकानी में.


हर सुखनवर है अब रवानी में.
कुछ नई बात है कहानी में.


उसने सदियों की दास्तां कह दी
एक लम्हे की बेज़ुबानी में.



यूं भी बुझती है तिश्नगी अपनी
जिस्म सहरा में जान पानी में.


जो ज़मीं की तलाश में निकले
खो गए शहरे-आसमानी में.


----देवेंद्र गौतम 

4 टिप्पणियाँ:

Dr Varsha Singh ने कहा…

उसने सदियों की दास्ताँ कह दी
एक लम्हे की बेज़ुबानी में.
यूँ भी बुझती है तिश्नगी अपनी
जिस्म सहरा में जान पानी में....

सभी शेर एक से बढ़कर एक.....
वाह!.......
क्या लाजवाब ग़ज़ल कही है.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

उसने सदियों की दास्ताँ कह दी
एक लम्हे की बेज़ुबानी में.

लाजवाब ग़ज़ल ....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

उसने सदियों की दास्ताँ कह दी
एक लम्हे की बेज़ुबानी में.

behtareen !!!!!!!

is se aage koi lafz nahin hai mere pas

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut sundar hai likha ..dil ko chhoota hua sa ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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