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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

कभी फलक, कभी उड़ते हुए.....

कभी फलक, कभी उड़ते हुए परिंदे सी.
ख़ुशी मिली है मुझे बारहा न मिलने सी.

शज़र का क्या है के पत्ते भी हिल नहीं पाए 
हवा चली थी किसी परकटे परिंदे सी. 


किसी के घर का पता कौन किसको बतलाये 
हम अपने घर में भी रहते हैं बनके परदेसी. 

न फर्क जीने का रहता है और न मरने का
सभी के सामने आती है इक घडी ऐसी.

वो हमको जिनकी बुलंदी पे नाज़ था इक दिन 
इमारतें भी वो लगने लगी हैं मलवे सी.

मिली है बारहा रातों की तीरगी में मुझे
वो रौशनी के भटकते हुए कबीले सी.


---देवेंद्र गौतम 

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह देवेन्द्र भाई वाह| क्या खूब ग़ज़ल और काफिया की बेहतरीन नज़ीर पेश की है आपने| बहुत बहुत बधाई देवेन्द्र भाई साब|

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  2. वो हमको जिनकी बुलंदी पे नाज़ था इक दिन इमारतें भी वो लगने लगी हैं मलवे सी.

    kya bat hai
    insan ki pooree zindagi ka nichor hai is akele sher men
    bahut khoob !

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  3. न फर्क जीने का रहता है और न मरने का
    सभी के सामने आती है इक घडी ऐसी.

    बहुत खूब कहा है आपने .......।

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  4. शज़र का क्या है के पत्ते भी हिल नहीं पाए
    हवा चली थी किसी परकटे परिंदे सी.
    waah...kya baat hai

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  5. किसी के घर का पता कौन किसको बतलाये
    हम अपने घर में भी रहते हैं बनके परदेसी

    ज़िंदगी को उसी की ज़बान में
    बात करने का हुनर ,,
    यानि आपका तर्ज़ ए बयाँ ....
    वाह !
    खूबसूरत ग़ज़ल !!

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  6. किसी के घर का पता कौन किसको बतलाये
    हम अपने घर में भी रहते हैं बनके परदेसी.

    न फर्क जीने का रहता है और न मरने का
    सभी के सामने आती है इक घडी ऐसी.

    बहुत खूब...बहुत खूब....बहुत खूब....

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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