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सोमवार, 1 मार्च 2010

फ़ना होते हुए.....

फ़ना होते हुए दीवार-ओ-दर की.
बड़ी मुद्दत पे याद आयी है घर की.


बना लेना घरौंदे इल्म-ओ-फन के
अभी कुछ खाक छानो दर-ब-दर की.


खुदा रूपोश होता जा रहा है
के आंखें खुल रहीं हैं अब बशर की.


रवां होता गया अपने जुनूं में
हवा जिसको नज़र आयी जिधर की.


हम अपनी मंजिलों से आशना हैं
ज़रुरत क्या है हमको राहबर की.


------देवेंद्र गौतम 

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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