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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

जो नदी चट्टान से......

जो नदी चट्टान से निकली नहीं है.
वो समंदर से कभी मिलती नहीं है.


हम हवाओं पे कमंदें डाल देंगे
ज़ुल्म की आंधी अगर रुकती नहीं है.


रास आ जाती हैं बेतरतीबियां भी
जिंदगी जब चैन से कटती नहीं है.


बादलों की ओट में सिमटा है सूरज
रात ढलकर भी अभी ढलती नहीं है.


अपने अंदर इस कदर डूबा हूं मैं
अब किसी की भी कमी खलती नहीं है.

---देवेंद्र गौतम  

3 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

हम हवाओं पे कमंदें डाल देंगे
ज़ुल्म की आंधी अगर रूकती नहीं है.

रास आ जाती हैं बेतरतीबियां भी
जिंदगी जब चैन से कटती नहीं है

बादलों की ओट में सिमटा है सूरज
रात ढलकर भी अभी ढलती नहीं है

बहुत ख़ूब !
ज़िंदगी की क़ौस ए क़ज़ह बिखेरती हुई ग़ज़ल

नीरज बसलियाल ने कहा…

second one was good

daanish ने कहा…

रास आ जाती हैं बेतरतीबियां भी
जिंदगी जब चैन से कटती नहीं है.

w a a h !!

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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