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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

आस्मां से कह रही है.....

आस्मां से कह रही है उलझनों की सरज़मीं.
लाख पैगम्बर हुए दुनिया वहीँ की है वहीँ.


पेड़-पौधे कट रहे हैं, खेत भी सूखे पड़े
गोद खाली कर रही है आजकल अपनी ज़मीं.


हर किसी ने हर किसी को हर तरफ धोखा दिया
अब किसी की बात पर कैसे करे कोई यकीं.


वक़्त इक ऐसा भी था कि रात-दिन का साथ था
वक़्त इक ऐसा भी है कि तुम कहीं और हम कहीं.


अब मेरे दिल में कोई रहता नहीं तो क्या हुआ
ये ज़रूरी तो नहीं कि हर मकां में हो मकीं.


----देवेंद्र गौतम 

2 टिप्‍पणियां:

  1. लाख पैगम्बर हुए दुनिया वहीँ की है वहीँ.

    ये सोच अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  2. वक़्त इक ऐसा भी था कि रात-दिन का साथ था
    वक़्त इक ऐसा भी है कि तुम कहीं और हम कहीं.

    हर किसी ने हर किसी को हर तरफ धोखा दिया
    अब किसी की बात पर कैसे करे कोई यकीं.

    बहुत ख़ूब !

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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