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बुधवार, 26 जनवरी 2011

इस कदर बज्मे-सुखन में तो......

इस कदर बज्मे-सुखन में तो ज़बांपोशी न थी.
और सब था बस मेरी फितरत में ख़ामोशी न थी.


रौशनी से तर-ब-तर लम्हों की सरगोशी न थी.
जिंदगी सरगोशी-ए-बज्मे-फरामोशी न थी.


बेबसी के खार थे चारो तरफ बिखरे हुए
जिंदगी की राह में खुशियों की गुलपोशी न थी.


गर्दिशे-हालत की काली फ़ज़ा रौशन रही
वक़्त की बाँहों में यूँ तारीक़ ख़ामोशी न थी.


रोजो-शब की उलझनों ने कर दिया पागल मुझे
बेखुदी तो थी मगर मुझमें जुनूंपोशी न थी.


गूंजते रहते थे कुछ यादों के नग्मे हर तरफ
जब तलक अहसास के आंगन में ख़ामोशी न थी.


आपके होठों पे कुछ लफ़्ज़ों के सागर थे मगर
आपके अंदाज़ में पहली सी मदहोशी न थी.


तीरगी की साख थे फैले सियह राहों में हम
नंगे पेड़ों की तो हमसे आबरू-पोशी न थी.


आज गौतम आशना चेहरों से कतराने लगा
कल तलक इसकी तो यूं अपनों से रूपोशी न थी.


---देवेंद्र गौतम 

2 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

4ख़ूबसूरत ग़ज़ल का सब से ख़ूबसूरत शेर मेरी नज़र में

गूंजते रहते थे कुछ यादों के नग्मे हर तरफ
जब तलक अहसास के आँगन में ख़ामोशी न थी

बहुत ख़ूब ,वाह !

Patali-The-Village ने कहा…

वह! बहुत खुबसूरत ग़ज़ल| धन्यवाद|

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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