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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

हरेक लम्हा लहू में फसाद.......

हरेक लम्हा लहू में फसाद जारी था.
अजीब खौफ मेरे जिस्मो-जां पे तारी था.


तुम्हारी राह में हरसू सुकूं के साये थे
हमारी राह में सहरा-ए-बेकरारी था.


हवा में डूब के देखा तो ये खुला मुझपर
के तिश्नगी का सफ़र हर नफस में जारी था.


मेरी तकान पे कतरा के तुम निकल जाते
यही तो दोस्तों! अंदाज़े-शहसवारी था.


मैं ढाल बन गया खुद अपनी शीशगी के लिए
हरेक सम्त से ऐलाने-संगबारी था.


सजे हुए थे बहुत अजमतों के आईने
मेरी ज़बीं पे मगर अक्से-खाकसारी था,


बुझे हुए थे निगाहों के बाम-ओ-दर गौतम
हमारे दिल में मगर रंगे-ताबदारी था.


----देवेन्द्र गौतम

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारी राह में हरसू सुकूं के साये थे
    हमारी राह में सहरा-ए-बेकरारी था
    क्या बात है गौतम जी !
    बहुत ख़ूब !उम्दा शायरी का लुत्फ़ आता है

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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