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गुरुवार, 3 मार्च 2011

अजमते-अहले-जुनूं की.....

अजमते-अहले-जुनूं की पायेदारी के लिए!
एक हम ही रह गए तजलीलो-ख्वारी के लिए!


जाने कब आंधी उठे इन पत्थरों के शह्र में
शीशा-शीशा मुन्तज़र है संगबारी के लिए.


अब किसी खिड़की पे कोई चांद सा चेहरा नहीं
चिलचिलाती धूप है मंज़र-निगारी के लिए.


फिर मेरे अहसास के आंगन में वो नंगे हुए
जो कहा करते थे सबसे पर्दादारी के लिए.


जब कभी अपनी हदों को तोड़कर निकला हूं मैं
कुछ बहाने मिल गए हैं उस्तवारी के लिए.


एक चौराहे पे कबसे चुप खड़ी है ये सदी
एक लम्हे की तलब है बेकरारी के लिए.


आज फिर गौतम ख़ुशी के अब्र हैं छाये हुए
और आंखें सर-ब-सर हैं अश्कबारी के लिए.


-----देवेंद्र गौतम

2 टिप्पणियाँ:

sagebob ने कहा…

बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है,गौतमजी.
हर शेर पायेदार. हर शेर उस्तवार.

अब किसी खिड़की पे कोई चांद सा चेहरा नहीं
चिलचिलाती धूप है मंज़र-निगारी के लिए.

फिर मेरे अहसास के आंगन में वो नंगे हुए
जो कहा करते थे सबसे पर्दादारी के लिए

बहुत खूब.
सलाम.

Dr Varsha Singh ने कहा…

अब किसी खिड़की पे कोई चांद सा चेहरा नहीं
चिलचिलाती धूप है मंज़र-निगारी के लिए.

लाजवाब, सुन्दर लेखनी को आभार...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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