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बुधवार, 2 मार्च 2011

उजड़े हुए खुलूस का.....

उजड़े हुए खुलूस का मंज़र करीब है.
यानी अब इस जगह से मेरा घर करीब है.


जिन हादसों ने मोम को पत्थर बना दिया
उन हादसों की आंच मुक़र्रर करीब है.


लिपटी हुई हैं बर्फ की चादर में ख्वाहिशें
शायद दहकते जिस्म का बिस्तर करीब है.


हालांकि कुर्बतों का कोई सिलसिला नहीं
इक शख्स है कि दूर भी रहकर करीब है.


अब रेज़ा-रेज़ा हो चुकीं परछाइयां तमाम
यानी बरहना धूप का खंज़र करीब है.


अब मेरे चारो ओर है मायूसियों का जाल
सहरा करीब है.. न समंदर करीब है.


आईन-ए-यकीन को गौतम बचा के रख
वहमो-गुमां का सरफिरा पत्थर करीब है.


----देवेन्द्र गौतम

4 टिप्पणियाँ:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय देवेन्द्र गौतम जी
सादर सस्नेहाभिवादन !


उजड़े हुए खुलूस का मंज़र करीब है
यानी अब इस जगह से मेरा घर करीब है



आईना-ए-यकीन को गौतम बचा के रख
वहमो-गुमां का सरफिरा पत्थर करीब है


मतले से ले'कर मक़्ते तक बेहतरीन !
मुबारकबाद !
♥ महाशिवरात्रि की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ! ♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

हालांकि कुर्बतों का कोई सिलसिला नहीं
इक शख्स है कि दूर भी रहकर करीब है

bahut khoob !
matla bhi bahut umda hai !

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!! क्या बात है...

निर्मला कपिला ने कहा…

सभी शेर एक से बढ कर एक हैं। गौतम जी को बधाई।

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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