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शनिवार, 5 मार्च 2011

मेरी छत पर देर तक.....

मेरी छत पर देर तक बैठा रहा.
इक कबूतर खौफ में डूबा हुआ.


हमने दरिया से किनारा कर लिया.
अब कोई कश्ती न कोई नाखुदा.


झूट के पहलू में हम बैठे हुए
सुन रहे हैं सत्यनारायण कथा.


देर तक बाहर न रहिये, आजकल
शह्र का माहौल है बदला हुआ.


ऐसी तनहाई कभी देखी न थी
इतना सन्नाटा कभी छाया न था.


पांचतारा जिंदगी जीते हैं वो
आमलोगों से उन्हें क्या वास्ता.


ख्वाब में जो बन गए थे दफअतन
पूछ मत अब उन घरौंदों का पता.


इक न इक खिड़की किसी ने खोल दी
बंद जब हर एक दरवाज़ा हुआ.  


-----देवेन्द्र गौतम

5 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी छत पर देर तक बैठा रहा.
    इक कबूतर खौफ में डूबा हुआ.
    waah ,,bahut khoob !

    झूट के पहलू में हम बैठे हुए
    सुन रहे हैं सत्यनारायण कथा.
    aaj ka sach jo kisi ek dharm tak seemit nahin

    पांचतारा जिंदगी जीते हैं वो
    आमलोगों से उन्हें क्या वास्ता.
    very true !

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  2. ख्वाब में जो बन गए थे दफअतन
    पूछ मत अब उन घरौंदों का पता.
    बहुत सुन्दर शेर है. पूरी ग़ज़ल ही बहुत सुन्दर है.बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मेरी छत पर देर तक बैठा रहा
    इक कबूतर खौफ में डूबा हुआ
    देर तक बाहर न रहिये, आजकल
    शह्र का माहौल है बदला हुआ

    दोनों शेर अपने मिज़ाज से वाक़िफ़ करवा पा रहे हैं
    लफ्ज़ भी, अपने इन्तखाब से मुतमईं हैं
    और ग़ज़ल
    बेहतर शाएरी की बेहतर मिसाल है

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही उम्दा गज़ल. सभी शेर बहुत उम्दा..बहुत अच्छे लगे..

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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