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सोमवार, 7 मार्च 2011

देखना ढह जायेंगे बेरब्त टीले.....

देखना ढह जायेंगे बेरब्त टीले खुद-ब-खुद.
फिर सिमट जायेंगे सब बिखरे कबीले खुद-ब-खुद.


कुछ करम मेरे जुनूं का, कुछ नवाज़िश आपकी
हो गए ज़ज़्बात के  पैकर लचीले खुद-ब-खुद.


आपकी चाहत के बादल खुल के बरसे भी नहीं
ख्वाहिशों के हो गए पौधे सजीले खुद-ब-खुद.


इक जरा छलकी ही थी खुशरंग मौसम की शराब
तह-ब-तह खुलने लगे मंज़र नशीले खुद-ब-खुद.


तल्खिए-हालत से आंखें मेरी पथरा गयीं
अब तेरी यादों के होंगे जिस्म नीले खुद-ब-खुद.


बात क्या कहनी थी गौतम क्या लबों ने कह दिया
हो गए अल्फाज़ के पैकर नुकीले खुद-ब-खुद.


-----देवेंद्र गौतम

4 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ करम मेरे जुनूं का, कुछ नवाज़िश आपकी
    हो गए ज़ज़्बात के पैकर लचीले खुद-ब-खुद

    बड़ी बारीक़ी से
    बहुत लचीला शेर कहा है जनाब...
    बहुत दिलचस्प !
    और
    तह-ब-तह खुलने लगे मंज़र नशीले खुद-ब-खुद
    सरूर की हदों को छू लेने वाला मिसरा...वाह !!

    आपके एहसास को छू कर वो शरमा-से गए
    लफ्ज़, बेशक हो रहे थे कुछ हठीले, खुद ब खुद

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  2. आपकी चाहत के बादल खुल के बरसे भी नहीं
    ख्वाहिशों के हो गए पौधे सजीले खुद-ब-खुद.

    बेहतरीन ग़ज़ल...हर शे‘र में आपका निराला अंदाज झलक रहा है।

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  3. बात क्या कहनी थी गौतम क्या लबों ने कह दिया
    हो गए अल्फाज़ के पैकर नुकीले खुद-ब-खुद.
    बहुत खूब.

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  4. कुछ करम मेरे जुनूं का, कुछ नवाज़िश आपकी
    हो गए ज़ज़्बात के पैकर लचीले खुद-ब-खुद.
    एक नज़ाकत पिन्हां है इस शेर में ,बहुत ख़ूब !


    फिर सिमट जायेंगे सब बिखरे कबीले खुद-ब-खुद.
    क्या बात है !

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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