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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

दर्दो-गम का इक समंदर.....

दर्दो-गम का इक समंदर रख लिया है.
हमने अपने दिल पे पत्थर रख लिया है.

चैन की इक सांस के बदले में हमने
अपने अंदर इक बवंडर रख लिया है.

अजमतों का बोझ कांधे से हटाकर
हमने अपने सर के ऊपर रख लिया है.


एक घर की आरज़ू थी इसलिए 
घर का इक नक्शा बनाकर रख लिया है.

एक चेहरा आईने के सामने है
और एक चेहरा छुपाकर रख लिया है.

जो बलाएं मेरा पीछा कर रही थीं
हमने उनको घर के अंदर रख लिया है.

उनको हमने जून की सौगात देकर 
अपने हिस्से में दिसंबर रख लिया है.

ताकि हर हमले का दे पायें जवाब
आस्तीं में हमने खंज़र रख लिया है.

---देवेंद्र गौतम

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह देवेन्द्र भाई वाह
    क्या गजल है| ये शेर तो दिल के बेहद करीब लगे

    चेहरा छुपा कर
    दे पाएँ जवाब
    एक घर की आरजू थी
    और ये वाला शेर तो भाई वाह
    जो बालाएँ मेरा पीछा कर रही थीं

    बहुत ही खूबसूरत गजल देवेन्द्र भाई

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  2. ग़ज़ल का मतला ख़ास तौर पर
    बहुत ज्यादा पसंद आया ..
    और
    एक घर की आरज़ू थी इसलिए ही
    घर का इक नक्शा बनाकर रख लिया है
    वक्त की, कुछ उठ पाने वाली
    करवटों की समझाता हुआ
    यह शेर भी क़ाबिल ए ज़िक्र है !

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  3. चैन की इक सांस के बदले में हमने
    अपने अंदर इक बवंडर रख लिया है.

    आदरणीय देवेन्द्र जी
    आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ ..बहुत सारी रचनाओं को पढने के बाद लगा कि आपका लेखन बहुत सशक्त है ...गजल विधा की बारीकियां मुझे भी सिखाने की कृपा करें ...आपका सदा आभारी रहूँगा

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  4. एक उम्दा मतले से शुरुआत और ग़ज़ल लोगों के ज़ह्न ओ दिल में क़ायम पज़ीर हो गई
    एक घर की आरज़ू थी इसलिए
    घर का इक नक्शा बनाकर रख लिया है

    बेहतरीन शेर !!!
    कितने अरमान हैं इंसानी जिंदगियों में जिसकी हद बस यहीं ख़त्म हो जाती है
    किसी शायर ने कहा है कि -
    "ये अलग बात है तामीर न होने पाए
    वरना हर ज़ह्न में इक ताजमहल होता है

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  5. चैन की इक सांस के बदले में हमने
    अपने अंदर इक बवंडर रख लिया है.

    यूं तो हर पंक्ति अपने आप में बेहतरीन है ..यह पंक्तियां बहुत ही अनुपम ....।

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  6. भाई केवल राम जी!
    मेरे कई ब्लॉग पर आप आये. मुझे प्रोत्साहित किया. इसके लिए शुक्रगुजार हूं. आप ग़ज़ल की बारीकियां जानना चाहते हैं यह अच्छी बात है. हिंदी उर्दू काव्य विधाओं में ग़ज़ल का अपना एक अलग फार्मेट, अलग मिजाज़ है. शेर कहे नहीं जाते नाजिल होते हैं. आपका मानस और भाव जगत काफिया रदीफ़ और बहर के साथ जुड़कर शेरों को प्रकट करता जाता है. जो बात आप कहना चाहते हैं वह कब किस ग़ज़ल के किस शेर में आकार लेगी पता नहीं होता. बहरहाल मैं कोई उस्ताद शायर नहीं हूं लेकिन फिर भी जितना जानता हूं दोस्ताना तौर पर उतना शेयर करने को तैयार हूं. आप जीमेल के जरिये मेरे संपर्क में रहें. ग़ज़ल कही है तो मेल करें. कहना शुरू करना चाहते हैं तो भी संपर्क में रहें. संभव है आपकी इच्छा पूरी हो.
    ---देवेंद्र गौतम

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  7. भाई नवीन जी...दानिश जी...इस्मत जैदी जी...सदा जी...आपलोगों का स्नेह ही कुछ नया कहने की तहरीक देता है. इस स्नेह को बनाये रखें यही गुज़ारिश है,

    -----देवेंद्र गौतम

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  8. उनको हमने जून की सौगात देकर
    अपने हिस्से में दिसंबर रख लिया है.

    दिसंबर रख लिया....लाजवाब ...

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  9. आदरणीय देवेंद्र गौतम जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    लगातार अच्छी ग़ज़लों के रूप में सरस्वती का प्रसाद बांटते रहने के लिए आभार !

    मुझे स्वयं पर गर्व होता है कि मैंने आपको मेल भेज कर सक्रिय होने का निवेदन किया था …
    हमेशा की तरह आपकी यह ग़ज़ल भी शानदार है … मन से दाद है !!

    आपकी ग़ज़लें बराबर पढ़ता रहता हूं , बहुत बार प्रतिक्रिया नहीं दे पाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं …

    नवरात्रि की शुभकामनाएं !

    साथ ही…

    नव संवत् का रवि नवल, दे स्नेहिल संस्पर्श !
    पल प्रतिपल हो हर्षमय, पथ पथ पर उत्कर्ष !!

    चैत्र शुक्ल शुभ प्रतिपदा, लाए शुभ संदेश !
    संवत् मंगलमय ! रहे नित नव सुख उन्मेष !!

    *नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !*


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  10. भाई राजेंद्र जी!
    निश्चित रूप से मुझे सक्रिय करने में आपके मेल का बड़ा योगदान है. आप मेरा ब्लॉग लगातार देख रहे हैं यह जानकार प्रसन्नता हुई. व्यस्तता के कारण कोमेंट नहीं कर पाना कोई समस्या नहीं है..बस प्रेम भाव बने रहना चाहिए.
    -----देवेंद्र गौतम

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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