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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

ज़मीं बदली, फलक बदला.....

"ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां  बदला".
मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.

गली बदली, नगर बदला, मकीं बदले, मकां बदला.
बस इक लम्हे की करवट से शबिस्ताने-जहां बदला.

वही लहजा पुराना सा, वही आदम, वही हव्वा 
न अपनी दास्तां बदली, न अंदाज़े-बयां बदला.


सफर करने से क्या हासिल, मेरे क़दमों की आह्ट से 
निगाहे-रहगुज़र बदली, मिज़ाजे-कारवां बदला. 

किताबे-उम्रे-फानी की हकीकत खुल गयी, जिस दिन 
वरक़ अपने मुक़द्दर का किसी ने नागहां बदला. 

जहां चांदी के बादल हैं, जहां सोने की बारिश है
सभी पौधों का कहना है के मौसम तो वहां बदला.

न जाने दुश्मनी क्या है कि  सदियों से यहां गौतम
मेरी सांसों से लेता है हरेक लम्हा धुआं, बदला. 

-------देवेंद्र गौतम 

15 टिप्‍पणियां:

  1. ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां बदला.
    मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.



    -बस्स!! इतना ही पूरा है..लूट लिया भाई...बहुत खूब!!

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  2. वही लहजा पुराना सा, वही आदम, वही हव्वा
    न अपनी दास्तां बदली, न अंदाज़े-बयां बदला.
    waah

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  3. देवेन्द्र गौतम साहब !
    आपको को पढ़ना
    हर बार इक नया तज्रबा ही रहता है ..
    अपने चौतरफे को महसूस करना
    और उसे अलफ़ाज़ की खूबसूरत शक्ल दे पाना
    आप ही का खास्सा है जनाब !
    वही लहजा पुराना सा, वही आदम, वही हव्वा
    न अपनी दास्तां बदली, न अंदाज़े-बयां बदला
    वाह !!

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  4. बहुत ही उम्दा गज़ल है गौतम जी. सभी अश-आर अच्छे लगे.

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  5. सफर करने से क्या हासिल, मेरे क़दमों की आह्ट से निगाहे-रहगुज़र बदली, मिज़ाजे-कारवां बदला.


    वाह ! बेसाख्ता ये लफ़्ज़ ज़बान पर आता है आप का कलाम पढ़ कर
    बहुत मुश्किल है इस ग़ज़ल से किसी एक शेर का चयन
    बहुत ख़ूबसूरत और मुरस्सा ग़ज़ल
    मुबारक हो

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  6. ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां बदला.
    मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.
    वाह जवाब नही इस शेर का । पूरी गज़ल बहुत अच्छी लगी। अभी पिछली गज़लें रहती हैं पढने से समय मिलते ही पढूँगी। धन्यवाद।

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  7. ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां बदला.
    मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.

    Bohot achha!!

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  8. ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां बदला.
    मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.

    गली बदली, नगर बदला, मकीं बदले, मकां बदला.
    बस इक लम्हे की करवट से शबिस्ताने-जहां बदला.

    वही लहजा पुराना सा, वही आदम, वही हव्वा
    न अपनी दास्तां बदली, न अंदाज़े-बयां बदला.


    ख़ूबसूरत और मुकम्मल ग़ज़ल
    हर शेर उम्दा....एक से बढकर एक......

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  9. bahut khoob...gautam ji ! bahut khoob.......... mai batata chalun ki 'vo' kyun nahi badle.....?

    log har baar tasveer badal dete hain
    loh har bar takdeer badal dete hain,
    har bar kaanp jaata hun mai.....
    sirf iraade hi badal paata hun mai...

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  10. ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां बदला.
    मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.
    वाह ... बहुत खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. देवेन्द्र जी आपकी जिस पोस्ट पर कमेन्ट नही होता समझो बुकमार्क जरूर कर ली है आजकल सभी ब्लागस पर जा नही पाती। आपकी गज़लों से तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसे भी बुकमार्क कर लिया है। फिर मेरी अभी इतनी विसात कहाँ किाप जैसे शायरों की गज़ल पर कुछ कह सकूँ। सिल को छूती गज़ल के लिये बधाई। जब भी पोस्ट करें गज़ल तो मुझे मेल भेजना न भूलें। धन्यवाद।

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  12. निर्मला कपिला जी
    नमस्कार
    मुझे जानकारी है कि अभी आप घर-परिवार में काफी व्यस्त हैं. नेट पर बैठने का कम समय मिलता है. यह जीवन का यथार्थ है. बच्चों का हक तो उन्हें देना ही होगा. आप अपना फ़र्ज़ अदा कर रही हैं.
    मेरी ग़ज़लें आपको अच्छी लगती हैं. यह आपकी ज़र्रानवाज़ी है. आप पारखी हैं. लेकिन मुझे लगता है मैं जो हूं आपने मेरे बारे में आपने कुछ उससे गुरुतर धारणा बना ली है. मैं बहुत साधारण और सहज इंसान हूं. सच पूछिए तो हम सभी एक-दूसरे से कुछ न कुछ सीखते हैं. इसीलिए मैं जिन ब्लोग्स को फोलो करता हूं उन्हें 'मेरी पाठशाला' और अपने ब्लोग्स को 'मेरा होमवर्क' कहता हूं. बहरहाल अपने हर पोस्ट की जानकारी आपको ईमेल से दूंगा यह मेरा वादा है. आपको जब भी फुर्सत मिले मेरे ब्लॉग देखें. उनकी कमियां भी बताएं. ताकि और बेहतर किया जा सके.

    -----देवेंद्र गौतम .

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  13. समीर लाल जी....रश्मि प्रभा जी.... दानिश जी.... राजीव भरोल जी....इस्मत जैदी जी, योगेन्द्र पाल जी....विशाल जी...डा.(सुश्री) शरद सिंह जी.....रमेश घिल्डियाल "धड़" जी....सदा जी....आपलोग मेरे ब्लॉग पर आये. मेरी हौसला अफजाई की. आप सभो का शुक्रगुज़ार हूं. इसी तरह स्नेह बनाये रखें. ताकि और बेहतर कहने की तहरीक मिलती रहे.

    -----देवेंद्र गौतम

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  14. नस्तर न चला दिल पर मेरे, रहम कर तो जरा |
    दिल की रोशनाई से, लिख रहा हूँ मुक्कदस तेरा |

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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