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रविवार, 17 अप्रैल 2011

अजीब ख्वाहिशों का ज़लज़ला है....

अजीब ख्वाहिशों का ज़लज़ला है घर-घर में.
किसी के पांव सिमटते नहीं हैं चादर में.

मैं ऐसा अब्र के जो आजतक भटकता हूं
वो एक नदी थी के जो मिल गयी समंदर में.


ख़ुशी नहीं, न सही, उसकी आहटें ही सही
चलो के कुछ तो मिला है मुझे मुक़द्दर में.

वो अपनी जान से एक रोज हाथ धो बैठा
जो जान फूंकने निकला हरेक पत्थर में.

वो एक आग का गोला था और ज़द में था
मुझे मिला था ठिठुरते हुए दिसंबर में.

-----देवेंद्र गौतम

15 टिप्पणियाँ:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय देवेंद्र गौतम जी
सादर अभिवादन !

आपने आज भी शानदार ग़ज़ल लिखी है

मैं ऐसा अब्र के जो आज तक भटकता हूं
वो एक नदी थी के जो मिल गयी समंदर में.

एहसासात की रग़ों को छू गया है यह शे'र … बहुत ख़ूब !

वो एक आग का गोला था और ज़द में था
मुझे मिला था ठिठुरते हुए दिसंबर में.

क्या अंदाज़े-सुख़न है … !
हमेशा की तरह अच्छी ग़ज़ल …

श्रेष्ठ लेखन के लिए आभार !


* हार्दिक शुभकामनाएं ! *


- राजेन्द्र स्वर्णकार

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

किसी के पांव सिमटते नहीं हैं चादर में.
ये अकेला मिसरा बहुत कुछ कहने में सक्षम है

मैं ऐसा अब्र के जो आजतक भटकता हूं
वो एक नदी थी के जो मिल गयी समंदर में.
बहुत ख़ूब !
एहसासात को अल्फ़ाज़ दे दिये हैं आप ने

Udan Tashtari ने कहा…

हर एक शेर पर दाद कबूलें, वाह!!

योगेन्द्र पाल ने कहा…

बहुत अच्छी गजल

सदा ने कहा…

हर पंक्ति अपने आप में बहुत कुछ कहती हुई ..।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वो अपनी जान से एक रोज हाथ धो बैठा
जो जान फूंकने निकला हरेक पत्थर में.

वो एक आग का गोला था और ज़द में था
मुझे मिला था ठिठुरते हुए दिसंबर में.


मन को छू लेने वाली शानदार ग़ज़ल...
सभी शेर लाजवाब हैं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल कही है ...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ख़ुशी नहीं, न सही, उसकी आहटें ही सही
चलो के कुछ तो मिला है मुझे मुक़द्दर में.
waah

ghazalganga ने कहा…

भाई राजेंद्र स्वर्णकार जी, इस्मत जैदी जी, समीर लाल जी, योगेन्द्र पाल जी, सदा जी, डा.(सुश्री) शरद सिंह जी, संगीता स्वरूप जी, रश्मि प्रभा जी हौसला अफजाई के लिए आप सबका शुक्रगुज़ार हूं. इसी तरह स्नेह बनाये रक्खें यही गुज़ारिश है.
---देवेंद्र गौतम

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

अजीब ख्वाहिशों का ज़लज़ला है घर-घर में.
किसी के पांव सिमटते नहीं हैं चादर में.
गौतम जी आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हुआ । एक खूबसूरत गज़ल से मुलाकात हुई ।

ghazalganga ने कहा…

संगीता स्वरुप (गीत) जी! चर्चा मंच में मेरी ग़ज़ल को शामिल करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
---देवेंद्र गौतम

ghazalganga ने कहा…

श्रीमती आशा जोगेलकर जी!
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है. आपको ग़ज़ल पसंद आई. मेरी हौसला-अफजाई हुई. कृपया स्नेह बनायें रखें.
---देवेंद्र गौतम

sushma 'आहुति' ने कहा…

panktiya bhut kuch kahti hui... bhut sunder...

Dilbag Virk ने कहा…

मैं ऐसा अब्र के जो आज तक भटकता हूं
वो एक नदी थी के जो मिल गयी समंदर में.
umda.....
sahityasurbhi.blogspot.com

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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