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मंगलवार, 10 मई 2011

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब......

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब सबसे जुदा होकर.
दिशाएं दूर बैठी हैं बहुत मुझसे खफा होकर.

ये मेरी वज्जादारी है निभा लेता हूं रिश्ते को 
वगर्ना क्या करोगे तुम भला मुझसे खफा होकर.


मैं इस तर्ह तुम्हारे कुर्ब की ख्वाहिश करूं जैसे 
खिलौने की करे ख्वाहिश कोई बच्चा बड़ा होकर.

मैं इन्सां हूं, हकीकत है, मगर उसके मुखालिफ हूं
जो इंसानी तकाजे भूल बैठा है खुदा होकर.

कोई मुझको बता जाये कि आखिर कौन हूं, क्या हूं 
कि खुद को भूल बैठा हूं मैं खुद से आशना होकर.

तुम्हारे पास बैठा हूं तो कुछ कीमत नहीं मेरी
मगर मैं याद आऊंगा तुम्हें तुमसे जुदा होकर.

मैं अपनी आग में जल-भुन के यूं कजला गया गौतम
के जैसे खुश्क हो जाये कोई पौधा हरा होकर.

----देवेंद्र गौतम

13 टिप्पणियाँ:

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सभी शेर लाजवाब.ग़ज़ल मत्ले से मक्ते तक बेहतरीन.

ललकार भी खूब है इस शेर में:-

ये मेरी वज्जादारी है निभा लेता हूं रिश्ते को
वगर्ना क्या करोगे तुम भला मुझसे खफा होकर.

Udan Tashtari ने कहा…

क्या बात है...हर शॆर लाजबाब!!!

daanish ने कहा…

फिर से
एक अच्छी ग़ज़ल पढवाई आपने
आपके कहे हर शेर पर
तारीफ़ के लफ्ज़ कहना मुश्किल होता जा रहा है
हर शेर लाजवाब !!
ये मेरी वज्जादारी है निभा लेता हूं रिश्ते को
वगर्ना क्या करोगे तुम भला मुझसे खफा होकर
वाह !!

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

तुम्हारे पास बैठा हूं तो कुछ कीमत नहीं मेरी
मगर मैं याद आऊंगा तुम्हें तुमसे जुदा होकर.

बेहद उम्दा दिल को छू लेने वाला शेर है
आप की ग़ज़लों का मेयार मुस्तक़िल बलन्द से बलंद्तर होता जा रहा हैं
मुबारक हो

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

मैं इन्सां हूं, हकीकत है, मगर उसके मुखालिफ हूं
जो इंसानी तकाजे भूल बैठा है खुदा होकर.
Khoob kaha.... bahut sunder post

सदा ने कहा…

तुम्हारे पास बैठा हूं तो कुछ कीमत नहीं मेरी
मगर मैं याद आऊंगा तुम्हें तुमसे जुदा होकर.

वाह .. बहुत खूब कहा है आपने ।

विशाल ने कहा…

bahut badhiya likha hai.
हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब सबसे जुदा होकर.दिशाएं दूर बैठी हैं बहुत मुझसे खफा होकर
bahut khoob.

शारदा अरोरा ने कहा…

hame to ye sher sabse jyada pasand aaya ...
मैं इस तर्ह तुम्हारे कुर्ब की ख्वाहिश करूं जैसे खिलौने की करे ख्वाहिश कोई बच्चा बड़ा होकर.
jaise apni haden hame maaloom hoti hain ...

prerna argal ने कहा…

कोई मुझको बता जाये कि आखिर कौन हूं, क्या हूं
कि खुद को भूल बैठा हूं मैं खुद से आशना होकर.

तुम्हारे पास बैठा हूं तो कुछ कीमत नहीं मेरी
मगर मैं याद आऊंगा तुम्हें तुमसे जुदा होकर.
bahut hi josh bhari satic gajal.aek aek shabd ka chayan laajabaab.bahut badhaai aapko.


please visit my blog and leave the comments also.tjhanks

अजय कुमार ने कहा…

bahut khoob , mubaarak ho

Rajesh Kumari ने कहा…

तुम्हारे पास बैठा हूं तो कुछ कीमत नहीं मेरी
मगर मैं याद आऊंगा तुम्हें तुमसे जुदा होकर..bahut behtreen sher poori ghazal hi laajabaab hai.charcha manch ka shukriya.

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की जा रही है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

लाजवाब गज़ल

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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