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शनिवार, 4 जून 2011

हवा में उड़ रहा है आशियाना

हवा में उड़ रहा है आशियाना.
परिंदे का नहीं कोई ठिकाना.

हमेशा चूक हो जाती है हमसे
सही लगता नहीं कोई निशाना.

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना.

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.




किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है भुलाना. 

निकलना रोज अंधेरी गली से
फिर अपने आप से आंखें चुराना.

न आयेंगे कभी हम दर पे तेरे
हमारे दर पे अब तुम भी न आना.

सभी बन्दूक की जद में खड़े थे
यहां हमला हुआ था कातिलाना. 

हमेशा मौत ने रुसवा किया है
मिला है जब भी जीने का बहाना.

----देवेंद्र गौतम 


17 टिप्पणियाँ:

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

Bahut hi achchhi ghazal likhi hai....badhaiyaan...

kase kahun? ने कहा…

किसी को याद रखना सख्त मुश्किलमगर उससे भी मुश्किल है भुलाना.kya bat hai... bahoot khoob...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Bahut hi lajawab ... har sher khil raha hai ... aur matle ka sher to jaise dil nikaal ke le gaya ...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.
...... main isi per yakeen rakhti hun

Udan Tashtari ने कहा…

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.


-उम्दा गज़ल.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

क्या बात है ,वाह .
बढ़िया ग़ज़ल.

pallavi trivedi ने कहा…

badhiya ghazal...

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

Khud se batiyaati sunder gazal. Badhai devendra ji.

daanish ने कहा…

har baar ki tarah
ek khoosurat gzl....
achhe alfaaz ,, achhee baangii ,,,
ye sher khaas taur par psand aye...

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना

किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है भुलाना

badhaaeeeeee .

Dr Varsha Singh ने कहा…

निकलना रोज अंधेरी गली से
फिर अपने आप से आंखें चुराना.

न आयेंगे कभी हम दर पे तेरे
हमारे दर पे अब तुम भी न आना.

क्या शेर कहे हैं आपने, बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल है !

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार और लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने! बधाई !
मेरे ब्लोगों पर आपका स्वागत है !

Markand Dave ने कहा…

आदरणीय श्रीगौतमजी,

"न आयेंगे कभी हम दर पे तेरे,
हमारे दर पे अब तुम भी न आना|"

इतनी भी क्या रूसवाई?

बहुत सुंदर, बधाई है।

मार्कण्ड दवे।

http://mktvfilms.blogspot.com

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.

किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है भुलाना.

khoobsoorat ghazal ke behtareen ash'aar

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना.

ये ज़ज्बा कायम रहे .....

निर्मला कपिला ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर गज़ल --
किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है उसे भूल जाना
लाजवाब।

'साहिल' ने कहा…

एक उम्दा ग़ज़ल. ये शेर तो सीधा दिल में उतर गए!

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना.

किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है उसे भूल जाना

हमेशा मौत ने रुसवा किया है
मिला है जब भी जीने का बहाना.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

किसी को याद रखना सख्त मुश्किल
मगर उससे भी मुश्किल है भुलाना.

भावनाओं की गहराइयों से निकला बहुत खूबसूरत शेर...
पूरी ग़ज़ल उम्दा है.

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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