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मंगलवार, 31 मई 2011

जरा सी जिद ने इस आंगन का.......

(यह ग़ज़ल 28 से 30 मई तक openbooksonline.com पर आयोजित obo लाइव तरही मुशायरा, अंक-11 के लिए कही थी. तरह थी-'जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.' काफिया-आ, रदीफ़-कराया है.)

समंदर और सुनामी का कभी रिश्ता कराया है?  
कभी सहरा ने गहराई का अंदाज़ा कराया है?

न जाने कौन है जिसने यहां बलवा कराया है.
हमारी मौत का खुद हमसे ही सौदा कराया है.

फकत इंसान का इंसान से झगड़ा कराया है.
बता देते हैं हम कि आपने क्या-क्या कराया है. 


अभी मुमकिन नहीं था पाओं को लंबा करा पाना
हरेक रस्ते को हमने इसलिए छोटा कराया है.

मिली जब कामयाबी तो ख़ुशी अपने लिए रक्खी
मगर रुसवा हुए तो शह्र को रुसवा कराया है.

उसे शहनाइयों की गूंज में मदहोश रहने दो 
अभी तो हाल में उस शख्स ने गौना कराया है.

तुम अपने दोस्तों और दुश्मनों को तौलकर देखो 
हवाओं ने कभी आंधी से समझौता कराया है?

समझ से काम लेते तो सभी मिल-जुलके रह लेते
'जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.'

-----देवेंद्र गौतम 

19 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया ग़ज़ल लिखी है आपने!

prerna argal ने कहा…

समझ से काम लेते तो सभी मिल-जुलके रह लेते
'जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.'bahut sunder lafjon main likhi bemisaal rachann.badhaai aapko.





please visit my blog and free feel to comment.thanks

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय देवेन्द्र गौतम जी

बेहतरीन ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें ।

जी कर रहा है कि तमाम शे'र कोट कर दूं …

ये अश्'आर तो दिल लूट ले गए -
# मिली जब कामयाबी तो ख़ुशी अपने लिए रक्खी
मगर रुसवा हुए तो शह्र को रुसवा कराया है.

# तुम अपने दोस्तों और दुश्मनों को तौलकर देखो
हवाओं ने कभी आंधी से समझौता कराया है?

… और बला की ख़ूबसूरती से बांधी है गिरह
# समझ से काम लेते तो सभी मिल-जुलके रह लेते
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.
वाह वाऽऽह !

आपकी लेखनी को तो मैं हमेशा नमन करता ही हूं …
:)

आभार और मंगलकामनाएं !

ana ने कहा…

wah ustad wah .....bahut badhiya

दिगम्बर नासवा ने कहा…

गौतम जी ... लाजवाब ग़ज़ल है ... हर शेर क़ाबिले तारीफ़ .. इसी बहर एमिन मैने भी आज एक गीत लिखा है ब्लॉग पर ...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सभी शेर बेहतरीन.प्यारी ग़ज़ल. वाह.

bahuroopiya ने कहा…

अभी मुमकिन नहीं था पाओं को लम्बा करा पाना,
हरेक रस्ते को हमने इसलिए छोटा कराया है.
हासिले ग़ज़ल.....वाह!

Kajal Kumar ने कहा…

वाह भई देवेन्द्र जी बहुत खूब

Rajesh Kumari ने कहा…

Devendra gautam ji aapki ghazal pahli bar padh rahi hoon bahut hi achchi lagi.bahut achcha likhte hain aap.shubhkamnaayen.

daanish ने कहा…

इंसान के जिंदगी में आने वाले
हर एक सच को
बखूबी बयान करती हुई
शानदार ग़ज़ल... वाह !
मक्ता तो खैर बहुत ही लाजवाब बन पडा है
बाक़ी के शेर भी क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं
पढ़ते पढ़ते
मन में बस जाने वाले ...
देवेन्द्र भाई मुबारकबाद कुबूल करें .

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

अभी मुमकिन नहीं था पाओं को लंबा करा पाना
हरेक रस्ते को हमने इसलिए छोटा कराया है.

समझ से काम लेते तो सभी मिल-जुलके रह लेते'
जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.'

bahut khoob !hasb e mamool umdagi men apni misal aap ,,,
girah khas taur par behtareen

इस्मत ज़ैदी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
इस्मत ज़ैदी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Ganesh Jee "Bagi" ने कहा…

आदरणीय देवेन्द्र गौतम जी, "OBO लाइव तरही मुशायरा" फेस बुक पर नहीं बल्कि www.openbooksonline.com पर प्रत्येक महीने के २० से ३० तारीख के मध्य कभी भी आयोजित किया जाता है | आपकी यह ग़ज़ल "OBO लाइव तरही मुशायरा" अंक ११ में प्रकाशित हुई है और ओ बी ओ के सुधि पाठको ने बहुत ही सराहा है आप सभी टिप्पणियों को नीचे दिए लिंक पर देख सकते है |
http://www.openbooksonline.com/forum/topics/obo-11now-close?id=5170231%3ATopic%3A82849&page=20#comments
आपका
गणेश जी "बागी"
संस्थापक
www.openbooksonline.com
(एक सामाजिक और साहित्यिक मंच)

Richa P Madhwani ने कहा…

http://shayaridays.blogspot.com

ghazalganga ने कहा…

बागी जी! नई इंट्री के कारण ऐसा हुआ. सुधार कर लिया है.
--देवेंद्र गौतम

Dr Varsha Singh ने कहा…

बहुत दिलचस्प .... बहुत रोचक ....

Rajeev Bharol ने कहा…

देवेन्द्र जी,
बहुत ही बढ़िया गज़ल कही है.. गिरह भी खूब बाँधी है. इतने खूबसूरत शेर कहे हैं की लाजवाब कर दिया.

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

kis sher ka jikr karen aur kise rahne den?
dil me umadta hai bahut vichaaron ka tufaan kise roken aur kise bahne den?
tum to ashaaron ka samandar ho mere dost! sanwaro n, kile dhahne den!
hawaaon me machalti rahe ghazlon ki khusbu, bhaunron ko jara dahakne den!
bahut kuch kahna chahti hai ghazlen 'gautam', mere kaan me kahne den....
maashaallah...bahut khoob.....

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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