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शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

लाख हमसाये मिले हैं......


लाख हमसाये मिले हैं आईनों के दर्मियां.
अजनवी बनकर रहा हूं दोस्तों के दर्मियां.

काफिले ही काफिले थे हर तरफ फैले हुए
रास्ते ही रास्ते थे मंजिलों के दर्मियां.



वक़्त गुज़रा जा रहा था अपनी ही रफ़्तार से
एक सन्नाटा बिछा था आहटों के दर्मियां.

राख के अंदर कहीं छोटी सी  चिंगारी भी थी
इक यही अच्छी खबर थी हादिसों के दर्मियां.

इसलिए बचते-बचाते मैं यहां तक आ सका
एक रहबर मिल गया था रहजनों के दर्मियां.

किसकी किस्मत में न जाने कौन सा पत्ता खुले
एक बेचैनी है 'गौतम' राहतों के दर्मियां.

----देवेंद्र गौतम

14 टिप्पणियाँ:

Rakesh Kumar ने कहा…

वाह! क्या उम्दा प्रस्तुति है

किसकी किस्मत में न जाने कौन सा पत्ता खुले
एक बेचैनी है 'गौतम' राहतों के दर्मियां.

खूबसूरत अंदाज है अभिव्यक्ति का.

बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर दर्शन दें.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल.सभी शेर अच्छे.
ये शेर:-
इसलिए बचते-बचाते मैं यहां तक आ सका
एक रहबर मिल गया था रहजनों के दर्मियां.
लाजवाब.

Udan Tashtari ने कहा…

राख के अंदर कहीं छोटी सी चिंगारी भी थी
इक यही अच्छी खबर थी हादिसों के दर्मियां.

-बहुत उम्दा...वाह!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इसलिए बचते-बचाते मैं यहां तक आ सका
एक रहबर मिल गया था रहजनों के दर्मियां.

वह क्या लाजवाब शेर है .... मज़ा आ गया ...वैसे पूरी गज़ल जानदार है ....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

राख के अंदर कहीं छोटी सी चिंगारी भी थी
इक यही अच्छी खबर थी हादिसों के दर्मियां.
waah

अल्पना वर्मा ने कहा…

वक़्त गुज़रा जा रहा था अपनी ही रफ़्तार से
एक सन्नाटा बिछा था आहटों के दर्मियां.
बहुत खूब!
लाजवाब ग़ज़ल !

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' ने कहा…

गौतम जी अब हम क्या लिखें इस प्यारी नज़्म के दर्मियां

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

राख़ के अंदर कहीं ..................हासिलेगजल खूबसूरत शेर| इस ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें गौतम भाई|

कुण्डलिया छन्द - सरोकारों के सौदे

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

लाजवाब ग़ज़ल .....

मंजुला ने कहा…

इसलिए बचते-बचाते मैं यहां तक आ सका
एक रहबर मिल गया था रहजनों के दर्मियां.

लाजवाब......वाह

शारदा अरोरा ने कहा…

badhiya lagi gazal...

सदा ने कहा…

बहुत खूब कहा है ।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

राख के अंदर कहीं छोटी सी चिंगारी भी थी
इक यही अच्छी खबर थी हादिसों के दर्मियां.

इसलिए बचते-बचाते मैं यहां तक आ सका
एक रहबर मिल गया था रहजनों के दर्मियां.

बहुत उम्दा !!
ख़ूबसूरत ग़ज़ल !!

kumar ने कहा…

राख के अंदर कहीं छोटी सी चिंगारी भी थी
इक यही अच्छी खबर थी हादिसों के दर्मियां.

बहुत ही बेहतरीन.....

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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