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शनिवार, 16 जुलाई 2011

इन्हीं सड़कों से रगबत थी......

इन्हीं सड़कों से रग़बत थी, इन्हीं गलियों में डेरा था.
यही वो शह्र है जिसमें कभी अपना बसेरा था.

सफ़र में हम जहां ठहरे तो पिछला वक़्त याद आया
यहां तारीकिये-शब है वहां रौशन सबेरा था.

वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं 
जहां हरसू खमोशी  थी, जहां हरसू अंधेरा था.

खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी
जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.

कोई तो रंग ऐसा हो कि जेहनो-दिल पे छा जाये
इसी मकसद से मैंने सात रंगों को बिखेरा था.

अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो बेरा था.

वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका
खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.

मैं अपने वक़्त से आगे निकल आता मगर गौतम 
मेरे चारो तरफ गुजरे हुए लम्हों का घेरा था.

-----देवेंद्र गौतम 

13 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका
खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.


-हर एक शेर बेहतरीन.....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.

बहुत ही लाजवाब ... बेहतरीन शेरों से सजी गज़ल ...

Sadhana Vaid ने कहा…

खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी
जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.

बहुत ही खूबसूरत गज़ल है ! हर शेर लाजवाब है और हर भाव अनुपम ! बधाई !

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं
जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.

खुबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई गौतम जी|

Dilbag Virk ने कहा…

वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं
जहां हरसू खमोशी थी, जहां हरसू अंधेरा था.

खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी
जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.
bahut khoob

Babli ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपका मेल मिलने पर! आपके बारे में जानकर ख़ुशी हुई!
बेहद ख़ूबसूरत और लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने! हर एक शेर एक से बढ़कर एक है!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

सदा ने कहा…

अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.

बहुत ही बढि़या ... ।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

खजाने लुट गए यारो! तो अब आंखें खुलीं अपनी
जिसे हम पासबां समझे हकीकत में लुटेरा था.

यही हक़ीक़त है.उम्दा शेर/अच्छी ग़ज़ल.

Dr Varsha Singh ने कहा…

अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.

वो एक आंधी थी जिसने हमको दोराहे पे ला पटका
खता तेरी न मेरी थी ये सब किस्मत का फेरा था.


लाजवाब.....बहुत खूब!

Dr Varsha Singh ने कहा…

जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो शबेरा था.

कृपया अन्यथा न लें.....शबेरा को सुधार कर सबेरा कर लें.....
निश्चय ही टाइपिंग भूल होगी....हार्दिक धन्यवाद !

निर्मला कपिला ने कहा…

अंधेरों के सफ़र का जिक्र भी मुझसे नहीं करना
जहां आंखें खुलीं अपनी वहीं समझो सबेरा था.
वाह लाजवाब। बहुत अच्छी लगी गज़ल। आभार।

kumar ने कहा…

कोई तो रंग ऐसा हो कि जेहनो-दिल पे छा जाये
इसी मकसद से मैंने सात रंगों को बिखेरा था.


बहुत खूब.....आपसे काफी कुछ सीखने को मिलेगा....

Dr HP Pandey ने कहा…

ग़ज़ल का हर शेर बेहद उम्दा है

डॉ. एच. पी. पाण्डेय 'अदब'

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आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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