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रविवार, 24 जुलाई 2011

खुदी के हाथ से निकला........

खुदी के हाथ से निकला तो फिर हलाक हुआ.
कफे-गुरूर में हर शख्स जेरे-खाक हुआ.

हरेक तर्ह की आबो-हवा से गुजरा हूं
ये और बात तेरी रहगुजर में खाक हुआ.


वो रातो-रात चमकने लगा सितारों सा 
उसे तराशने वाला भी ताबनाक हुआ.

ये कच्चे धागों का बंधन है या तमाशा है
अभी-अभी हुई शादी अभी तलाक हुआ.

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.

तलब की आखिरी मंजिल अजीब मंजिल है
कि  इस मुकाम पर जो पहुंचा वो हलाक हुआ.

मुहब्बतें मिलीं मुझको न नफरतें गौतम
अजीब रंग में दामन जुनू का चाक हुआ.

-----देवेंद्र गौतम  

17 टिप्पणियाँ:

Sunil Kumar ने कहा…

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.
बहुत खुबसूरत ग़ज़ल मुबारक हो .....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ...

बहुत खूब ... क्या शेर निकाले हैं जनाब ... सुभान अल्ला ... दिल करता है सभी शेर एक एक कर के कोट कर दूं ...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हर शेर अच्छे ,खूबसूरत ग़ज़ल..बधाई.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खूब ..खूबसूरत ग़ज़ल

Dilbag Virk ने कहा…

ये कच्चे धागों का बंधन है या तमाशा है
अभी-अभी हुई शादी अभी तलाक हुआ.
bahut khoob
poori gazal khoobsoorat

bahuroopiya ने कहा…

अच्छी ग़जल ..सभी शेर अच्छे ..मेरी पसंद ..हरेक तरह की आबो-हवा से गुजरा हूँ,........बधाई !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वो रातो-रात चमकने लगा सितारों सा
उसे तराशने वाला भी ताबनाक हुआ.

बहुत खूबसूरत गज़ल ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज 25- 07- 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

Dr Varsha Singh ने कहा…

ये कच्चे धागों का बंधन है या तमाशा है
अभी-अभी हुई शादी अभी तलाक हुआ.
मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.


खूबसूरत ग़ज़ल...

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.

हर शेर उम्दा....एक से बढकर एक......

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

हरेक तर्ह की आबो-हवा से गुजरा हूं
ये और बात तेरी रहगुजर में खाक हुआ..behtarin sher roopi pholon se bana gazal ka khobsurat guldasta..bahut bahut badhai

daanish ने कहा…

कफे-गुरूर में हर शख्स जेरे-खाक हुआ

इसी खूबसूरत मिसरे से आगे बढ़ते हुए
पूरी ग़ज़ल की ख़ूबसूरती से वाक़िफ होता गया हूँ
पिछले ज़माने में 'सौती क़ाफ़िया' ग़ज़लों की भी
एक अपनी रवायत रही है
वैसा ही इक अहसास होना,, अच्छा लगा...
मुबारकबाद .

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने! हर एक शेर लाजवाब है!

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

हरेक तरह की आबोहवा ..............

वाह क्या बात कही है गौतम जी, जय हो|



घनाक्षरी समापन पोस्ट - १० कवि, २३ भाषा-बोली, २५ छन्द

vandana ने कहा…

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.
तलब की आखिरी मंजिल अजीब मंजिल है
कि इस मुकाम पर जो पहुंचा वो हलाक हुआ.
बेहतरीन गज़ल ...!!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बहुत खूब ... क्या शेर निकाले हैं जनाब .

kumar ने कहा…

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.
क्या बात है.....गजब .....

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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