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बुधवार, 9 नवंबर 2011

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.
फिर घनी हो गयी जो रात थी ढलने वाली.

अपने अहसास को शोलों से बचाते क्यों हो
कागज़ी वक़्त की हर चीज है जलने वाली . 


एक सांचे में सभी लोग हैं ढलने वाले  
जिंदगी मोम की सूरत है पिघलने वाली.

फिर सिमट जाऊंगा  ज़ुल्मत के घने कुहरे में 
देख लूं, धूप किधर से है निकलने वाली. 

एक जुगनू है शब-ए-गम के सियहखाने में 
एक उम्मीद है आंखों में मचलने वाली.

----देवेंद्र गौतम 

10 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

फिर सिमट जाऊंगा ज़ुल्मत के घने कुहरे में
देख लूं, धूप किधर से है निकलने वाली.

वाह !!!
अच्छी ग़ज़ल है बस आप की ग़ज़ल में ये passimistic approach खटक रहा है ,आप की ग़ज़लें तो प्रोत्साहित करती हैं

Kunwar Kusumesh ने कहा…

एक जुगनू है शब-ए-गम के सियहखाने में
एक उम्मीद है आंखों में मचलने वाली.

ये शेर बढ़िया है.
सच है कि आशा की एक किरण के सहारे तो आदमी ज़िंदगी काट सकता है.

anju(anu) choudhary ने कहा…

उम्दा शेर ...बहुत खूब

बेनामी ने कहा…

भाई देवेन्द्र जी,
बहुत सुंदर व अच्छी गजल लिखी है | हालात के अनुसार इंसान को चलने की मज़बूरी बयां करती है | आप ऐसे ही लिखते रहें, ताकि पाठकों को सुकून मिलता रहे और हालात से लड़ने कि ताकत मिलती रहे |
आपका भाई,
रवीन्द्र नाथ सिन्ह|

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खूबसूरत गज़ल

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत खूब ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।
कल 16/11/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है।

धन्यवाद!

अनुपमा पाठक ने कहा…

बहुत खूब!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बढ़िया गज़ल ....
सादर...

अतुल प्रकाश त्रिवेदी ने कहा…

सुन्दर रचना , परन्तु इस्मत भाई से सहमत हूँ की थोड़ी आशा भी दिखाएँ

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत खूब सर!

सादर

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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