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शनिवार, 19 नवंबर 2011

अपनी-अपनी जिद पे अड़े थे

अपनी-अपनी जिद पे अड़े थे.
इसीलिए हम-मिल न सके थे.

एक अजायब घर था, जिसमें
कुछ अंधे थे, कुछ बहरे थे.


फिसलन कितनी थी मत पूछो
हम गिर-गिरकर संभल रहे थे.

खुद से पहली बार मिला था
जिस दिन तुम मुझसे बिछड़े थे.

बच्चों की सोहबत में रहकर
हम भी बच्चे बने हुए थे.

इसीलिए खामोश रहे हम
उनकी भाषा समझ गए थे.

आखिर कबतक खैर मनाते
हम कुर्बानी के बकरे थे.

----देवेंद्र गौतम







9 टिप्पणियाँ:

अनुपमा पाठक ने कहा…

इसीलिए खामोश रहे हम
उनकी भाषा समझ गए थे.
बहुत खूब!

kshama ने कहा…

एक अजायब घर था, जिसमें
कुछ अंधे थे, कुछ बहरे थे.

फिसलन कितनी थी मत पूछो
हम गिर-गिरकर संभल रहे थे.
Behad sundar panktiyan! Waise to pooree rachana hee lajawab hai!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खुद से पहली बार मिला था
जिस दिन तुम मुझसे बिछड़े थे.


बहुत खूब ..सुन्दर प्रस्तुति

anju(anu) choudhary ने कहा…

बच्चों की सोहबत में रहकर
हम भी बच्चे बने हुए थे.

बहुत खूब ....मन से बच्चे ही बने रहे ...
खूबसूरत ग़ज़ल

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

खुद से पहली बार मिला था
जिस दिन तुम मुझसे बिछड़े थे.

kya bat hai ,,haasil e ghazal sher hai

फिसलन कितनी थी मत पूछो
हम गिर-गिरकर संभल रहे थे.

waah ! bahut khooob !!

vandana ने कहा…

बच्चों की सोहबत में रहकर
हम भी बच्चे बने हुए थे.

वाह बहुत बढ़िया

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत खूब ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

खुद से पहली बार मिला था
जिस दिन तुम मुझसे बिछड़े थे...

कमाल के शेर हैं सभी गौतम जी और इस शेर ने तो कतल ही कर दिया ...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…






आदरणीय देवेंद्र गौतम जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

एक और ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए आभार !
हर शे'र काबिले-तारीफ़ है -
एक अजायब घर था, जिसमें
कुछ अंधे थे, कुछ बहरे थे

लाजवाब !

पूरी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद !
बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
- राजेन्द्र स्वर्णकार

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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