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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

ऐसी सूरत चांदनी की

ऐसी सूरत चांदनी की.
नींद उड़ जाये सभी की.

एक लम्हा जानते हैं
बात करते हैं सदी की.

हम किनारे जा लगेंगे
धार बदलेगी नदी की.

मंजिलों ने आंख फेरी
रास्तों ने बेरुखी की.

जंग जारी है मुसलसल
आजतक नेकी बदी की.

जाने ले जाये कहां तक 
अब ज़रुरत आदमी की.

अब ज़रूरत ही नहीं है 
आदमी को आदमी की.

एक जुगनू भी बहुत है
क्या ज़रूरत रौशनी की.

---देवेंद्र गौतम 







5 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!! क्या बात है!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा ग़ज़ल!

jaat na puchho.... ने कहा…

सर! आपके शेर तो...देखन को छोटे लगे घाव करे गंभीर

voiceoftheday ने कहा…

जाने ले जाये कहां तक
अब ज़रुरत आदमी की.

अब ज़रूरत ही नहीं है
आदमी को आदमी की.

एक जुगनू भी बहुत है
क्या ज़रूरत रौशनी की.

क्या बात है भाई....बहुत खूब!

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब।

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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