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शनिवार, 26 मई 2012

कौन किसकी पुकार पर आया

कौन किसकी पुकार पर आया.
जो भी आया करार पर आया.

तेज़ रफ़्तार कार पर आया.
कौन गर्दो-गुबार पर आया?

सबकी गर्दन को काटने वाला 
आज चाकू की धार पर आया.

जो छपा था महज़ दिखावे को 
मैं उसी इश्तेहार पर आया.

शाख दर शाख कोपलें फूटीं 
खुश्क जंगल निखार पर आया.

उसने दोजख से इक उछाल भरी 
और जन्नत के द्वार पर आया.

एक सौदा निपट गया गोया 
लाख मांगा हज़ार पर आया.

सबके तलवे लहूलुहान मिले 
कौन फूलों के हार पर आया?

जीत पर उतना खुश नहीं था मैं 
जो मज़ा उसकी हार पर आया.

एक तूफ़ान थम गया गौतम 
एक दरिया उतार पर आया.

----देवेंद्र गौतम 



6 टिप्पणियाँ:

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग

विचार बोध
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

kshama ने कहा…

Kya gazab likhte hain aap! Tareef ke liye alfaaz nahee milte!

निर्मला कपिला ने कहा…

एक सौदा निपट गया गोया
लाख मांगा हज़ार पर आया.

जीत पर उतना खुश नहीं था मैं
जो मज़ा उसकी हार पर आया.वाह क्या बात है सुन्दर गज़ल बधाई।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

जीत पर उतना खुश नहीं था मैं
जो मज़ा उसकी हार पर आया.


bahut khoob !!

सदा ने कहा…

सबके तलवे लहूलुहान मिले
कौन फूलों के हार पर आया?
अनुपम भाव लिए उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ।

छोटे ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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