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सोमवार, 4 जून 2012

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.

जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.

कई बार लौटा हूं उसकी गली से
कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!

कभी दोस्ती की रवायत निभाए
कभी वो पलटकर पलटवार कर दे.

कोई मेरी छत के करे चार टुकड़े 
कोई मेरे आंगन में दीवार कर दे.

मैं क्या उसको समझूं, मैं क्या उसको जानूं 
मेरा हक भी जो मुझको थक-हार कर दे.

वो है या नहीं है, नहीं है कि है 
यही सोच मुझको न बीमार कर दे.

----देवेंद्र गौतम 


11 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार लौटा हूं उसकी गली से
    कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!

    ऐसे में ऐसा ही होता है

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  2. कोई मेरी छत के करे चार टुकड़े
    कोई मेरे आंगन में दीवार कर दे.

    bahut khoob !! umda ghazal !!

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  3. अनुपम भाव संयोजन से सजी उम्दा गजल

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  4. गौतमजी,
    आपकी गजल का कोई जवाब नहीं आप बेमिसाल हैं

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  5. कई बार लौटा हूं उसकी गली से
    कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!


    बहुत खूब ... लाजवाब शेर है देवेन्द्र जी इस गज़ल का ... ये हसीनों की आदत है ...

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  6. har sher lajwaaab pahli baar aapke bpog par aai hun aur sach bahut hi achha laga
    behtreen gajale liye
    bahut bahut badhai
    poonam

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  7. वाह ... बहुत खूब कहा है आपने ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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