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मंगलवार, 20 नवंबर 2012

हम डूबते सूरज की इबादत नहीं करते

कितना भी लाल पीला हो सोहबत नहीं करते.
हम डूबते सूरज की इबादत नहीं करते.

इस दर्ज़ा तो ऐ दोस्त! हिमाक़त नहीं करते.
सूरज से जुगनुओं की तिजारत नहीं करते.

इतना दबे हुए हैं किताबों के बोझ से
इस दौर के बच्चे भी शरारत नहीं करते.

रह जाते हैं सब खूबियां अपनी समेटकर
जो लोग अपने फन की तिजारत नहीं करते.

जो लोग आप लिखते हैं किस्मत की इबारत
हांथों की लकीरों की शिकायत नहीं करते.

बागी जिन्हें समझती है दुनिया वो दरअसल
मिल-बांट के खाते हैं बगावत नहीं करते.

फिर क्यों न मानते वो हमारी हरेक बात
हम कर के दिखाते हैं नसीहत नहीं करते.

----देवेंद्र गौतम

5 टिप्पणियाँ:

शारदा अरोरा ने कहा…

कितना भी लाल पीला हो सोहबत नहीं करते.
हम डूबते सूरज की इबादत नहीं करते.
इस शेर को पढ़ कर लगा था कि ये तो बड़े स्वार्थीपन वाली बात हो गई...मगर फिर समझा कि ये दुनिया के लिए कहा गया है ..दुनिया सिर्फ चढ़ते सूरज को ही सलाम करती है ...सारी गजल बहुत अच्छी लगी ...

छोटे ने कहा…

badhiya sher nikale hain, badhai!

अल्पना वर्मा ने कहा…

इतना दबे हुए हैं किताबों के बोझ से
इस दौर के बच्चे भी शरारत नहीं करते.
वाह!वाह!!
बहुत ही वज़नदार बात कही है .
बहुत उम्दा ग़ज़ल .

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब ...हमेशा की तरह लाजवाब प्रस्‍तुति

tbsingh ने कहा…

bahut khoob kaha aapne.

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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