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रविवार, 10 मार्च 2013

चलते-चलते सूई घडी की रुक जाती है

दम लेने को एक ठिकाना ढूँढ रही है.
अपनी गाड़ी जाने कब से बेपटरी है.

हमने बांध लिया है सारी नदियों को
इसीलिए जीवन की नैया डूब रही है.

बस जायें जिस देस में लेकिन कुछ नस्लों तक
अपनी मिटटी की खुशबू बाकी रहती है.

बेमकसद परदेस की खाक नहीं छानी
हमने अपनी मिटटी की खुशबू बांटी है.

उन आंखों ने ख्वाब बहुत देखे होंगे
जिन आंखों में 'नीर भरी दुःख की बदली' है.

अपने दिल की धड़कन पर काबू रखना
चलते-चलते सूई घडी की रुक जाती है.

खून रगों में दौड़ रहा है कुछ ऐसे
जिस्म के अंदर जैसे एक नदी बहती है.

आवारा बादल मंडराते रहते हैं
धरती अपने मरकज़ पर कायम रहती है.

मतलब की दुनिया है गौतम, क्या समझे!
हर नेकी में पोशीदा थोड़ी सी बदी है.

---देवेंद्र गौतम



5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल,आभार.

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  2. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  3. बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल.!.!.

    उत्तर देंहटाएं
  4. हमने बांध लिया है सारी नदियों को
    इसीलिए जीवन की नैया डूब रही है.

    बहुत खूब! सामयिक मुद्दों पर बढ़िया अशआर

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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