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शनिवार, 18 मई 2013

सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो

खूब सजा के रख बाजार में जैसा हो.
सबकुछ बिकता है संसार में जैसा हो.

पूजा की थाली में रक्खा जाता है
तुलसी का पत्ता आकार में जैसा हो.

उससे निस्बत रखनी है तो रखनी है
मिलने-जुलने बात विचार में जैसा हो.

घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
मोल भले उसका बाजार में जैसा हो.

दिन के उजाले में मासूम ही दिखता है
उसका चेहरा अंधकार में जैसा हो.

उसपर कोई आंच नहीं आने देना
घर का बच्चा है व्यवहार में जैसा हो.

--देवेंद्र गौतम

4 टिप्‍पणियां:

  1. पूजा की थाली में रक्खा जाता है
    तुलसी का पत्ता आकार में जैसा हो.
    उसपर कोई आंच नहीं आने देना
    घर का बच्चा है व्यवहार में जैसा हो.


    kya bat hai sr bhot khub bhot khub.....aasan lafzo me bdi gageri bat kah di aapni....bhot shubh kamnaye.....ae anmol sher hai behad aanmol

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  2. घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
    मोल भले उसका बाजार में जैसा हो.

    हकीकत से जुड़े शेर हैं सभी ... लाजवाब गज़लों में एक नई किश्त ... मज़ा आ गया ...

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  3. बढ़िया ...पहली लाइन को छोड़ कर बाकी सारी पंक्तियों में ..जैसा हो लिखने की जगह अगर आप ..चाहे जैसा हो ..लिखें तो कैसा रहे ?...कुछ मिसिंग सा लग रहा है ..

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  4. घर की मुर्गी दाल बराबर होती है
    मोल भले उसका बाजार में जैसा हो.

    Waqayi zingame aisahee hota hai...mera aalekh zaroor padhen!

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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