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शुक्रवार, 16 मई 2014

धरती को अपनी धूरी पर रहने दो

कु़दरत की मस्ती को कायम रहने दो.
मत बांधो, सारी नदियों को बहने दो.

आसमान को चाहो तो छू सकते हो
धरती को अपनी धूरी पर रहने दो.

बंगला-गाड़ी की उसको दरकार नहीं
रौशनदान में गोरैया को रहने दो.

बुरे-भले का फर्क जमाना कर लेगा
हम जो कहना चाह रहे हैं, कहने दो.

हम तो उनकी ईंट से ईंट बजा देंगे
जुल्मो-सितम जिनको सहना है सहने दो

लॉकर में रखना है तो क्या फर्क उन्हें
सोने, चांदी या पीतल के गहने दो.

वीरानी में डूबे घर का क्या करना
दरक-दरक कर दीवारों को ढहने दो.

--देवेंद्र गौतम



4 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-05-2014) को "पंक में खिला कमल" (चर्चा मंच-1615) (चर्चा मंच-1614) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Akhil ने कहा…

वाह. सुन्दर रचना। ग़ज़ल के कुछ शेर बहुत उम्दा हैं. दाद कबूल करें.

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सभी अच्छे लगे .

Priyambara Buxi ने कहा…

सुन्दर रचना .

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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