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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

जो अपना नाम किसी फन में कर गए रौशन.
उन्हीं के नक्शे-कदम पर हैं काफिले रौशन.

ये कैसे दौर से यारब, गुजर रहे हैं हम
न आज चेहरों पे रौनक न आइने रौशन.

किसी वरक़ पे हमें कुछ नजऱ न आएगा
किताबे-वक्त में जब होंगे हाशिये रौशन

हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
किसी गरीब की कुटिया कोई करे रौशन.

हरेक सम्त अंधेरों की सल्तनत है मगर
दिलों में फिर भी उमीदों के हैं दिये रौशन.

हमारे पांव तो कबके उखड़ चुके हैं मगर
ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

सवाल सबके भरोसे का है मेरे भाई
कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन.
--देवेंद्र गौतम


5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर वर्ष २०१५ की प्रथम चर्चा में दिया गया है
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    नव वर्ष-2015 आपके जीवन में
    ढेर सारी खुशियों के लेकर आये
    इसी कामना के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुन्दर गजल प्रस्तुति
    आपको नए साल की हार्दिक मंगलकामनाएं!

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  4. हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
    किसी गरीब की कुटिया कोई करे रौशन.
    हर शेर हीरे की तरह ... मज़ा आ गया देवेन्द्र जी ... और ये शेर साथ लिए जा रहा हूँ ...

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  5. हमारे पांव तो कबके उखड़ चुके हैं मगर
    ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

    सवाल सबके भरोसे का है मेरे भाई
    कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन.
    bahut hi sundar ....dil se nikli hui shayri...

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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