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बुधवार, 7 जनवरी 2015

ज़िंदगी मेरा बुरा चाहती है

और जीने की रज़ा चाहती है
ज़िंदगी मेरा बुरा चाहती है

आंधियों से न बचाये जायें
जिन चराग़ों को हवा चाहती है

सर झुकाये तो खड़ा है हर पेड़
और क्या बादे-सबा चाहती है

बंद कमरे की उमस किस दरजा
हर झरोखे की हवा चाहती है

मेरी तकलीफ़ बिछड़ कर मुझसे
मुझको पहले से सिवा चाहती है

--देवेंद्र गौतम

3 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-01-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1852 में दिया गया है
धन्यवाद

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत ही लाजवाब शेर हैं देवेन्द्र जी ..मज़ा गया ...

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है देवेन्द्र जी ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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