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बुधवार, 22 जुलाई 2015

मन की गहराई का अंदाजा न था.

मन की गहराई का अंदाजा न था.
डूबकर रह जायेंगे, सोचा न था.

कितने दरवाज़े थे, कितनी खिड़कियां
आपने घर ही मेरा देखा न था                                                    

एक दुल्हन की तरह थी ज़िन्दगी
गोद में उसके मगर बच्चा न था.                                                            

इक कटीली झाड़ थी चारों तरफ
बस ग़नीमत है कि मैं उलझा न था.

बारहा मुझको तपाता था बहुत
एक सूरज जो कभी निकला न था.

पेड़ का हिस्सा था मैं भी दोस्तो
मैं कोई टूटा हुआ पत्ता न था.

दूसरों के दाग़ दिखलाता था जो
उसका दामन भी बहुत उजला न था.

-देवेंद्र गौतम

2 टिप्पणियाँ:

Digamber Naswa ने कहा…

पेड़ का हिस्सा था मैं भी दोस्तो
मैं कोई टूटा हुआ पत्ता न था.
वाह ... क्या बात कह दी देवेन्द्र जी ... दर्द तो हर किसी को होता है बिछुड़ जाने का ...

शारदा अरोरा ने कहा…

कितने दरवाज़े थे, कितनी खिड़कियां
आपने घर ही मेरा देखा न था

bahut badhiya

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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