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मंगलवार, 19 जनवरी 2016

आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.

आंच शोले में नहीं, लह्र भी पानी में नहीं.
और तबीयत भी मेरी आज रवानी में नहीं.

काफिला उम्र का समझो कि रवानी में नहीं.
कुछ हसीं ख्वाब अगर चश्मे-जवानी में नहीं.

खुश्क होने लगे चाहत के सजीले पौधे
और खुशबू भी किसी रात की रानी में नहीं.

क्या जरूरी है उसे सबको सुनाया जाए
कुछ नई बात अगर अपनी कहानी में नहीं.

चंद खुशरंग से लम्हों की कसक है गोया
और कुछ भी मेरी रंगीन बयानी में नहीं.

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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