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रविवार, 23 जनवरी 2011

यही खाना-ब -दोशी है.....

यही खाना-ब -दोशी है, इसे बेहतर समझ लेना.
जहां रुकना, जहां टिकना, उसी को घर समझ लेना.


मेरे अन्दर है कितना मौसमों का डर, समझ लेना.
मैं फूलों का मुहाफ़िज़ हूं, मुझे पत्थर समझ लेना.


कभी घर में ही बन जाता है दफ्तर, यूं भी होता है.
कभी दफ्तर को ही पड़ता है अपना घर समझ लेना.


जहां तक फ़ैल सकते हैं, तुम अपने पाओं फैलाओ
मगर फैलेगी कितना अक्ल की चादर समझ लेना


---देवेंद्र गौतम .

4 टिप्पणियाँ:

Kunwar Kusumesh ने कहा…

ग़ज़ल में पाँच से ग्यारह तलक के शेर होते हैं,
मगर इन चार शेरों को ज़रा हटकर समझ लेना

daanish ने कहा…

मेरे अन्दर है कितना
मौसमों का डर, समझ लेना.
मैं फूलों का मुहाफ़िज़ हूँ,
मुझे पत्थर समझ लेना.

इस खूबसूरत शेर पर ढेरों मुबारकबाद
और दुआओं की शक्ल में ....

समझ आएं न जब इस ज़िंदगी के मुख्तलिफ़ तेवर
ग़ज़ल के शेर कहते हैं, हमें पढ़ कर समझ लेना

ghazalganga ने कहा…

भाई कुंवर कुसुमेश जी!
ग़ज़ल की शास्त्रीय अवधारणा के तहत आपका कहना एक हद तक सही है. ग़ज़ल के शेरों की संख्या विषम रखने का प्रचलन रहा है. लेकिन यह कोई अनिवार्य शर्त नहीं है. ज़दीद तहरीक के दौरान कई बंदिशें टूटीं हैं. पहले मक्ता के बिना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती थी. अब कई शायर मक्ता कहते ही नहीं. हुआ तो रख लिया. वरना जो शेर हुए उन्हीं से ग़ज़ल मुकम्मल हो गयी. नामी गिरामी उस्ताद शायरों की बाज ग़ज़लों में मतला ही नहीं है. दरअसल शेर नहीं कहे जाते, उनकी आमद होती है. ग़ज़लकार के हाथ में कुछ नहीं होता. सबकुछ अपने आप होता चला जाता है. अक्सर मुकम्मल मान ली गयी ग़ज़ल के कुछ शेर एक अंतराल के बाद अचानक फूट निकलते हैं और उन्हें जोड़ लेना होता है. बहरहाल, आपने तवज्जो फ़रमाया इसके लिए शुक्रगुजार हूँ.

ghazalganga ने कहा…

वाह भाई दानिश जी! टिप्पणी के क्रम में आप इस ज़मीन पर बहुत प्यारा शेर कह गए. कुंवर कुसुमेश जी की तरह. रवां बह्र है. लगता है आपलोगों से कुछ और शेर कहलवाएगी. खुशामदीद!

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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