समर्थक

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

ख्वाहिशों का इक छलकता......

ख्वाहिशों का इक छलकता जाम था.
इक परी थी और इक गुलफाम था.


हर वरक पर भीड़ थी, कोहराम था
हाशिये में चैन था, आराम था.


हर अंधेरे घर में उसका काम था.
उसके अन्दर रौशनी का जाम था.


धीरे-धीरे हिल रही थीं पुतलियां
उसकी आँखों में कोई पैगाम था.


जिसने मिट्टी में मिला डाला मुझे
दिल का सरमाया उसी के नाम था.


आज उसका नाम सबके लब पे है
कल तलक वो आदमी गुमनाम था.


मुझको उसकी और उसे मेरी तलब
मैं भी प्यासा वो भी तश्नाकाम था.


हर फ़रिश्ते पर उठी है उंगलियां
क्या हुआ गर मैं भी कुछ बदनाम था.


------देवेंद्र गौतम

1 टिप्पणी:

  1. हर वरक पर भीड़ थी, कोहराम था
    हाशिये में चैन था, आराम था

    मुझको उसकी और उसे मेरी तलब
    मैं भी प्यासा वो भी तश्नाकाम था.

    वाह देवेंद्र जी बहुत ख़ूब !

    हर फ़रिश्ते पर उठी है उंगलियां
    क्या हुआ गर मैं भी कुछ बदनाम था
    क्या बात है !

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें