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शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

हरेक लफ्ज़ में नौहा है.....

हरेक लफ्ज़ में नौहा है बेज़ुबानी का.
कहां से लाओगे उन्वां मेरी कहानी का.

बहुत असर हुआ पौधों की बेज़ुबानी का.
के राज़ खुल गया मौसम की हुक्मरानी का.

तुम्हें भी हर कोई खाना-बदोश कहता है
हमारे सर पे भी साया है लामकानी का.

खुली जब आंख तो बिखरी थी धूप चारो तरफ
अजीब रंग था ख्वाबों की सायबानी का.

न हमको तल्खि-ये-इमरोज़ से शिकायत है
न इंतज़ार है फर्दा की गुलफिशानी का.

ज़बां से गर्द बिखरने लगे तो चुप रहना
के इसके बाद तो आलम है बदजुबानी का.

बहुत गुरूर था अपने वजूद पर हमको
वजूद क्या था बस इक बुलबुला था पानी का.

ख़ुदा ने जिनको अता की  हैं रहमतें गौतम
उन्हें भी खौफ नहीं कहरे-आसमानी का.


-----देवेंद्र गौतम

3 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

न हमको तल्ख़ि-ये-इमरोज़ से शिकायत है
न इंतज़ार है फ़र्दा की गुलफ़िशानी का.
वाह ,बहुत ख़ूब! अगर यही सोच ज़िंदगी में शामिल हो जाए तो जीना आसान हो जाए

ज़बां से गर्द बिखरने लगे तो चुप रहना
के इसके बाद तो आलम है बदज़ुबानी का
क्या बात है !नए अंदाज़ का शेर असर छोड़ने में कामयाब है

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत असर हुया----
बहुत गरूर था---
जवांम्गर्द बिखरने लगे--- लाजवाब अशार हैं। बहुत असर हुया शायद ये कहन पहले कहीं कहा नही गया। लाजवाब गज़ल के लिये धन्यवाद।

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आपकी ग़ज़ल का एक एक शेर लाजवाब है.
मत्ले से मक्ते तक पूरी ग़ज़ल लाजवाब.

ज़बां से गर्द बिखरने लगे तो चुप रहना
के इसके बाद तो आलम है बदज़ुबानी का

बढ़ी सादगी से बड़ी बात कह दी आपने. खूब.

बोलते हुए शेर हैं ,बोलते हुए.
आप में ग़ज़ल कहने का हुनर कमाल का है.बधाई.
पढ़कर अच्छा लगा.

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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