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रविवार, 13 मार्च 2011

ये और बात के लफ़्ज़ों की.....

ये और बात के लफ़्ज़ों की बेहिजाबी थी.
मेरे लबों प तो जो बात थी किताबी थी.


तबाह कर दिया मौसम की  ज़र्दपोशी ने
हमारे शहर की रंगत कभी गुलाबी थी.


तमाम जिस्म थे मलबूसे-जां समेटे हुए
हमारी आंखों के सहरा में बेहिजाबी थी.


मैं हर्फ़-हर्फ़ था बिखरा हुआ वरक-ब-वरक
के मेरे अहद की तकदीर ही किताबी थी.


शिकस्त खाता हूं हर लम्हा अब, मगर पहले
कदम-कदम प मेरे साथ कामयाबी थी.


बुझा-बुझा था मैं बेकैफ मौसमों की तरह
हरेक सम्त की आबो-हवा शराबी थी.


मुझे किसी की शराफत प शक न था गौतम
मैं जानता हूं के मुझमें ही कुछ खराबी थी.


---देवेंद्र गौतम

3 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

मैं हर्फ़-हर्फ़ था बिखरा हुआ वरक-ब-वरक
के मेरे अहद की तकदीर ही किताबी थी.

शिकस्त खाता हूं हर लम्हा अब, मगर पहले
कदम-कदम प मेरे साथ कामयाबी थी.

bahut khoob !
umda ghazal!

sagebob ने कहा…

बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल है.

मैं हर्फ़-हर्फ़ था बिखरा हुआ वरक-ब-वरक
के मेरे अहद की तकदीर ही किताबी थी.

वाह!बहुत खूब.
सलाम.

शारदा अरोरा ने कहा…

vaah , bahut hi badhiya gazal ..

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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