समर्थक

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

दिलों में तैरती कागज़ की नाव.....

दिलों में तैरती कागज़ की नाव तो देखो. 
नदी तो देखो, नदी का बहाव तो देखो.

मैं कौन हूं मेरे नज़दीक आओ तो देखो.
तुम अपने आप को मुझमें छुपाओ तो देखो.

ज़मीन पांव तले है न आस्मां सर पर
नज़र की धुंध को लेकिन हटाओ तो देखो. 


सियाह रात के आंचल में ख्वाब हैं कितने
दबीज़ नींद का पर्दा हटाओ तो देखो.

दिलों के बीच रफाकात की डोर कटती है
हिसारे-कुर्ब में बढ़ते तनाव तो देखो.

हरेक सिम्त ही कौसे-कुजह का आलम है
मेरे मिजाज़ की दुनिया में आओ तो देखो.

मैं तीरगी में उजालों की बात करता हूं
मेरे ख्याल का अबके घुमाव तो देखो.

वही पहाड़, वही खौफ और वही कुहरा 
मेरे वजूद के परदे हटाओ तो देखो.

तमाम उम्र अंधेरों में गुम रहा गौतम
सियाह वक़्त का मुझसे लगाव तो देखो.

---देवेंद्र गौतम  

8 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वही पहाड़, वही खौफ और वही कुहरा
मेरे वजूद के परदे हटाओ तो देखो.
तमाम उम्र अंधेरों में गुम रहा गौतम
सियाह वक़्त का मुझसे लगाव तो देखो

bahut khoob !
itni aasani aur sahajta se baaten kah lena ap ke fan ki pukhtagee ka zamin hai.

daanish ने कहा…

मैं तीरगी में उजालों की बात करता हूं
मेरे ख्याल का अबके घुमाव तो देखो

इज़हार की पुख्तगी
और पुरकशिश अदायगी....
हर शेर अपने आप को पढवा रहा है
"सियाह वक़्त का मुझसे लगाव तो देखो.."
वाह !!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

वही पहाड़, वही खौफ और वही कुहरा
मेरे वजूद के परदे हटाओ तो देखो.
waah

सदा ने कहा…

बहुत खूब ...हर पंक्ति अपने आप में बेमिसाल ...।

निर्मला कपिला ने कहा…

पूरी गज़ल ही बहुत सुन्दर लगी। चूँकि मुझे अभी गज़ल की पूरी समझ नही है तो मै यहाँ कुछ शंका मे पड गयी हूँ अगर इसका निवारण कर सकें तो कृपा होगी-- क्या काफिये मे कई शेरों मे नाव घुमाव आदि आ रहा है तो कई मे हटाओ आदि क्या ऐसा हो सकता है जब कि मतले मे इसे आव से बान्ध दिया गया है। इसे अन्यथा न लें मेरी शंका का निवारण जरूर करें। धन्यवाद।

ghazalganga ने कहा…

हिंदी काफिये के एतबार से आपका सवाल बिलकुल सही है निर्मला कपिला जी! लेकिन दरअसल काफिया ओ है. नाव या नाओ दोनों में एक ही ध्वनि निकलती है. इसलिए इसका प्रयोग जायज़ है. उर्दू में भी इसे सही माना जाता है. उम्मीद है शंका का समाधान हो गया होगा.
---देवेंद्र गौतम

mridula pradhan ने कहा…

दिलों में तैरती कागज़ की नाव तो देखो.
नदी तो देखो, नदी का बहाव तो देखो.
wah.kya sundar likha hai....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

निर्मला दी ,उर्दू भाषा के अनुसार इन सभी क़ाफ़ियों की spellings और तलफ़्फ़ुज़ ठीक हैं

एक टिप्पणी भेजें

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें